यूं ही नहीं जलता चिराग धधक कर तूफानों में ,
यूं ही नहीं जलता चिराग धधक कर तूफानों में ,
आशियां आबाद करने के लिए
अपनी पूरी ताकत को न्योछावर करना पड़ता है,
हर तूफान को स्वयं सहकर वफ़ानिभाता है वो अक्सर बुझ जाता ,अपनो के फरेब मिले धीमे झोंके से ..
चिराग तो चिराग है जलना और बुझना ,माना तासीर… है उसकी, पर बताना भी तो लाजमी है, ..इनायत में दमक जाता था जो कभी, बगावत में वही दहक जाता है अभी,
ज्यादा जोर आजमाइश भी ठीक नही संबंधों में,
बात बनते बनते अक्सर बिगड़ भी जाती है।
हवाएं नए दौर की जब बुझाने लौ(बच्चे) कोआमादा हो जाए,
तारीख गवाह है आज भी धधक कर जलता बूढ़ा चिराग(मुखिया) घर का आज भी..
✍️अश्रु