बुज़ुर्गों की उपेक्षा – समाज की आत्मकेन्द्रिक त्रासदी
बुज़ुर्गों की उपेक्षा – समाज की आत्मकेन्द्रिक त्रासदी
■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■
हर समाज की पहचान उसके बुज़ुर्गों के सम्मान और स्थान से होती है। जिस घर में बड़े-बुज़ुर्गों का स्नेह, आशीर्वाद और अनुभव मौजूद हो, वह घर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कारशाला होता है। लेकिन आधुनिक जीवन की आपाधापी और बदलते पारिवारिक ढांचे ने इस नींव को गहरा आघात पहुँचाया है। आज अनेक बुज़ुर्ग अपने ही घर में परायों की तरह रह रहे हैं—यह स्थिति न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए त्रासदी से कम नहीं।
समय बदलता है, और उसके साथ इंसान की सोच, जीवनशैली व प्राथमिकताएँ भी। आज का इंसान सफलता की ऊँचाइयों को छू रहा है, लेकिन इस सफलता की दौड़ ने उसे इतना व्यस्त कर दिया है कि उसके पास न दूसरों के लिए समय है और न ही स्वयं अपने लिए। इस अंधी दौड़ ने सबसे गहरी चोट उस पीढ़ी पर की है, जिसने कभी हमें अपने हाथों में थामकर जीवन का पहला पाठ पढ़ाया था।
कभी यह वही धरती थी, जहाँ श्रवणकुमार की कथा सुनाई जाती थी; जहाँ माता-पिता को देवतुल्य मानकर उनका सम्मान करना जीवन का परम कर्तव्य समझा जाता था। लेकिन अफसोस! आज वही परंपरा धीरे-धीरे ढह रही है। संयुक्त परिवारों का बिखरना, आत्मकेंद्रित जीवन की बढ़ती प्रवृत्ति और एकांकी परिवारों की चाह ने बुज़ुर्गों को न केवल अकेला कर दिया है, बल्कि उन्हें अपने ही घर में पराया बना दिया है।
आज हालात इतने विचित्र हो चुके हैं कि अपने ही संतान माता-पिता को बोझ समझने लगी है। कभी शब्दों से, तो कभी व्यवहार से उन्हें ठेस पहुँचाई जाती है। यहाँ तक कि मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की घटनाएँ अब कोई अपवाद नहीं रह गईं। अखबारों की सुर्खियाँ बार-बार हमें यही दिखाती हैं कि अपमान और उपेक्षा के बोझ तले कितने बुज़ुर्ग चुपचाप घुट-घुटकर जी रहे हैं।
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस अन्याय में अब बेटियाँ भी बेटों के साथ बराबर की भागीदार बनती जा रही हैं। यह वह स्थिति है, जहाँ समाज की आत्मा स्वयं से ही प्रश्न करती है—क्या यही हमारी परंपरा थी? क्या यही वह मूल्य थे जिन पर हमें गर्व था?
कानून बनते हैं, योजनाएँ आती हैं, सहायता राशि तय होती है; परंतु सच्चाई यह है कि बुज़ुर्गों को पैसों की नहीं, अपने बच्चों के स्नेह, साथ और सम्मान की आवश्यकता होती है। कानून भय पैदा कर सकता है, पर प्रेम, त्याग और सेवा की भावना नहीं जगा सकता।
हमें यह गहराई से समझना होगा कि हर बुज़ुर्ग अपने भीतर अनुभवों का अमूल्य खजाना संजोए बैठा है। वे हमारे अतीत की जीवित धरोहर हैं और हमारे वर्तमान का सहारा। यदि आज हम उन्हें उपेक्षित करेंगे, तो कल हमारे अपने बच्चे भी हमें उसी दर्पण में दिखाएँगे।
बुज़ुर्गों का सम्मान करना केवल नैतिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का आधार है। उनका आशीर्वाद परिवार को स्थिरता, शांति और गहराई प्रदान करता है। यदि हम आज अपने बुज़ुर्गों के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार करेंगे तो हमारा भविष्य भी उसी कटु अनुभव से गुज़रेगा।
अतः आवश्यकता है कि हम अभी जागें, अपने परिवार में बुज़ुर्गों के लिए प्रेम और सम्मान का वातावरण बनाएँ। यही हमारी संस्कृति की आत्मा है और यही हमारी अगली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा उत्तराधिकार होगा।
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद