दोहा पंचक. . . . विविध
दोहा पंचक. . . . विविध
आखिर है किस बात का, बन्दे तुझे गरूर।
मुट्ठी भर औकात पर, मद में रहता चूर ।।
गाफिल क्यों अंजाम से, ओ बन्दे नादान ।
अच्छे कर्मों से सजा, जीवन का दीवान ।।
धन वैभव सब कुछ किया, संचित अपने पास ।
फिर भी क्यों बुझती नहीं, और और की प्यास ।।
साथ चलेंगी नेकियाँ, बन्दे रखना याद ।
पाप कर्म से जिंदगी, मत करना आबाद ।।
साथ बाँध कर आज तक, कौन गया उस पार ।
अंत समय सब छीनता, यह स्वार्थी संसार ।।
सुशील सरना / 23-9-25