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23 Sep 2025 · 5 min read

परवरिश

परवरिश
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एक छोटा सा शहर जहां एक हँसते मुस्कुराते बच्चे का जन्म हुआ। घर का माहौल भी अच्छा था। घर में खुशियों के गीत गाए जा रहे थे ।सुमन भी बहुत खुश थी। उसके बेटे के मुख को देखकर उसकी बार-बार बलिया ले रही थी। आस पड़ोस की महिलाएं सुमन को बधाई देती जा रही थी ,लेकिन सुमन को क्या पता था कि यह खुशियां ज्यादा दिनों तक नहीं है।
सुमन का बेटा जैसे ही एक वर्ष का हुआ। उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। और सुमन को छोड़कर चला गया। जहां सुमन की आंखों में खुशियों के आंसू थे । वहां गम के आंसू टपकने लगे थे। लोग कहने लगे सुमन की किस्मत को तो देखो बेचारी ,कैसे बच्चे का लालन-पालन करेगी।
समय बीतता गया। सुमन ने सोचा जो किस्मत में था। उसे भुगतना ही पड़ेगा सुमन ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। सुमन ने अपने बच्चों की परवरिश के लिए लोगों के घरों में भोजन बनाना चालू कर दिया।
जैसे-जैसे बालक 5 वर्ष का हुआ। उसने शिक्षा प्रारंभ करवा दी। सुमन जब बच्चे को स्कूल भेजती थी, तब पड़ोसी तथा गांव वाले उसे ताने देने लगे, क्या करेगी इसे पढ़ाई लिखाई कराके। उसे मजदूरी ही तो करना है। इन तानों से परेशान होकर सुमन ने अपने बेटे को अपनी बहन के यहां पढ़ाई के लिए भेज दिया। बहन ने भी सुमन के बेटे पर ध्यान नहीं दिया, और थोड़े दिन के बाद ही उसे काम पर लगा दिया। बेचारी सुमन करती भी तो क्या उसकी पाले में तो गरीबी का बोझ था ,और लोगों के ताने।
लेकिन सुमन का दृढ़ विश्वास बहुत था वह बच्चे को पढ़ना चाहती थी। सुमन ने कुछ दिनों के बाद ही बेटे को वापस घर बुला लिया। और आगे की पढ़ाई जारी रखी। सुमन चाहती थी कि निक्कू कभी भी अपने आप को बिना पिता के ना समझे। सुमन दिन-रात मेहनत करती है खुद भूखी रहती, लेकिन निक्कू को अच्छी-अच्छी किताबें लाकर देती। निक्कू समझदार हो गया था। और मां की भावना को समझने लगा था। एक दिन किसी ने स्कूल से आते वक्त कहा यह गरीबों का बेटा क्या करेगा पढ़ाई करके। इसकी मां तो घरों में काम करने जाती है।
निक्कू ने मां से कहा_ में अब पढ़ाई नहीं करूंगा।
मैं भी आपके साथ काम में हाथ बताऊंगा। लेकिन सुमन ने मना करते हुए कहा बेटा कोई बात नहीं कहने वाले जो भी कहते हैं उसे पर ध्यान देना छोड़ दें। बस मैंने जो सपना देखा है उसे पूरा करने की तेरी जिम्मेदारी है।
निक्कू मन लगाकर पढ़ाई करने लगा।12th क्लास में मेरिट में उसका नाम आया।
निक्कू की अच्छे नंबरों की वजह से उसे छात्रवृत्ति मिलने लगी और वह आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर चला गया। लेकिन उसका मन शहर में भी नहीं लगता था । क्योंकि यहां वह अपनी मां को अकेला छोड़ कर गया था।
शहर जाते समय मां ने एक वचन लिया निक्कू तू अच्छी पढ़ाई करके एक अच्छा इंसान बनकर लौटेगा ,तभी मेरी परवरिश सही मानूंगी। निक्कू ने अपनी मां को वचन दिया कि मां एक दिन तेरे सपनों को जरूर पूरा करूंगा। सुमन निक्कू को पढ़ाई के लिए मदद करने लगी। कई बार तो सुमन खाली पेट ही सो जाती केवल वह अपने निक्कू को एक बड़ा इंसान बनना देखना चाहती थी।
निक्कू शहर में जाकर इंजीनियर की पढ़ाई करने लगा और पढ़ाई करते हुए ही अच्छे नंबरों से वहां पास हो गया। मेरिट में आने की वजह से उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। बहुत खुश था क्योंकि उसकी मां का सपना पूरा हो चुका था। अब कोई भी गांव वाले और आस-पड़ोस के लोग उसकी मां को गरीब कहकर ताने नहीं मारेंगे।
निक्कू नौकरी करने लगा और अपनी पहली सैलरी से अपनी मां के लिए साड़ी लेकर पहुंचा। जैसे ही मां ने उसे देखा गले लगा लिया। और कहा बेटा आज मेरी तपस्या सफल हो गई।
निक्कू की कामयाबी की खबर अखबारों में छपी खबर सुनते ही उसके पिता बेचैन हो गए। और उन्होंने देखते ही फोन लगाया। और माफी मांगने लगे। सुमन सब बातें सुन रही थी। सुनते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए। निक्कू ने आंसू पोछते हुए पूछा _मां क्या हुआ। मां ने कहा बेटा कुछ नहीं यह तो खुशी के आंसू है। निक्कू ने कहा मां पिताजी मुझसे मिलना चाहते हैं। सुमन ने बिना सोचे समझे हां बोलते हुए, अपने कमरे में चली गई।
सुमन ने सोचा अब जब निक्कू को इतनी खुशियां मिली है। तो मैं क्यों उसे अपने पिता के स्नेह से दूर रखूं । उसमें उसका क्या दोष।
निक्कू अपने पिता से मिलने गांव गया। पिताजी ने गले लगा कर अपनी दो बेटियों से निक्कू का परिचय कराया और कहा यह तेरी बहने हैं और तेरी जिम्मेदारी भी। निक्कू ने कहा ठीक है पिताजी में अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा के साथ निभाऊंगा। बहने भी अपने भाई को देखकर बहुत खुश हो गई।
पिता ने निक्कू से कहा _बेटा यह जायजाद अब तेरी ही है ।और तुझे आगे संभालना है।
मैंने जो गलती की शायद वह माफी लायक तो नहीं है ,लेकिन मैं अपनी बची हुई जिम्मेदारी को पूरा करना चाहता हूं यदि तुम्हें ठीक लगे तो तुम अपनी मां के साथ यहां आकर रह सकते हो।
सुमन ने यह बात सुनकर वहां जाने से मना कर दिया। निक्कू ने पिता को आश्वासन दिया कि मैं आपसे बहनों से मिलने आता जाता रहूंगा।
गांव से आने के बाद निक्कू ने सारा वृत्तांत मां को सुनाया मां ने कहा ठीक है बेटा जो हुआ उसको भूल जा। और जो खुशी तुम्हे मिली है। मैं बहुत खुश हूं।
सुमन आंखें बंद करके भगवान से प्रार्थना करने लगी की है ईश्वर तूने जो दुख बचपन में निक्कू को दिए थे, लेकिन उसके बदले तूने जो ढेर सारा स्नेह दिया उसे पर किसी की नजर मत लगने देना।
इस तरह सुमन की परवरिश ने निक्कू का जीवन सवार दिया। जो गांव के लोग उसे गरीब कहकर ताने मारते थे।आज सब उसका सम्मान करने लगे। सुमन की त्याग और तपस्या की वजह से आज निक्कू एक सफल इंजीनियर बन गया। और उसने अपनी मां की गोद खुशियों से भर दिया।
इस कहानी से शिक्षा मिलती है की चाहे गरीबी हो लेकिन बच्चों की परवरिश अच्छे से की जाती है तो बच्चे एक दिन अपने माता-पिता का नाम जरूर रोशन करते हैं।
डॉ मनोरमा चौहान

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