#गौरवमयी_प्रसंग
#गौरवमयी_प्रसंग
(राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह जी “दिनकर” की जयन्ती पर)
■ लड़खड़ाती “राजनीति” को “साहित्य का सबक़।”
कल से अधिक प्रासंगिक आज।
●प्रणय प्रभात●
आज विधि सम्मत या नीति विरुद्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मर्यादा को लेकर जारी द्वंद के बीच एक प्रसंग स्मरण में आ रहा है, जिसे साझा करना बहुत प्रासंगिक है। प्रसंग में है हाल ही में आसपास के कुछ देशों में तंत्र के विरुद्ध आम जनता, विशेष कर युवाओं की मुखरता। हालांकि आंदोलन की आड़ में उन्माद के साथ विध्वंस को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता, तथापि यह अवश्य कहा जा सकता है कि भुगता उन्होंने है, जिन्होंने समय के संदेश को समय रहते स्वीकार न करने को अपनी प्रभुसत्ता माना। शेष आप आज के प्रसंग से समझ जाएंगे।
बात 78 बर्ष पूर्व अर्थात 1947 की है। स्वाधीन हुए हमारे देश के प्रथम स्वाधीनता दिवस पर प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू पहले ध्वजारोहण के लिए लाल किले की प्राचीर की ओर अग्रसर थे। साथ मे विशिष्ट राजनेताओं सहित राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह “दिनकर” भी थे।ध्वज मंच की सीढ़ियां चढ़ते हुए पं. नेहरू अचानक से लड़खड़ाए और गिरने को हुए। इससे पहले कि वे नीचे गिरते, बलिष्ठ कद-काठी के दिनकर जी ने उन्हें तत्काल अपनी शक्तिशाली भुजाओं में संभाल लिया।
नेहरू जी ने दिनकर जी को तुरंत धन्यवाद देते हुए कहा कि आज उनकी वजह से वे गिरने व लज्जित होने से बच गए। इस त्वरित टिप्पणी पर दिनकर जी ने तात्कालिक रूप से जो प्रत्युत्तर दिया वो कालजयी है और सदैव रहेगा। दिनकर जी ने क्षण भर भी सोचे बिना तपाक से कहा-
“इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है पंडित जी! देश की राजनीति जब-जब भी लड़खड़ाएगी या गिरेगी, साहित्य उसे इसी तरह संभालता रहेगा।”
धन्य हैं ऐसे महान पुरोधा और उनके अकाट्य व साहसिक विचार। जो कल भी सशक्त थे, आज भी प्रेरक हैं व कल और भी प्रासंगिक रहेंगे। बशर्ते बेशर्म, दंभी और सिद्धान्त विमुख सियासत साहित्य की महत्ता व उसके प्रति कृतज्ञता का आभास कर सके। जो आज के माहौल में संभव नहीं लगता। फिर भी राष्ट्रहित में यह स्मरण कराना हमारा धर्म है और कुत्सित राजनीति करने वालों के विरुद्ध आप सभी का कर्त्तव्य। ताकि समय आने पर हुंकार सकें कि-
“सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है।”
अन्यथा, भावी पीढियां हमें धिक्कारे बिना न रहेंगी। जिसका संकेत राष्ट्रकवि श्री दिनकर बरसों पहले इन दो पंक्तियों में धरोहर के रूप में देकर गए हैं :-
“समर शेष है, नहीं युद्ध का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा, उनका भी अपराध।।”
हालांकि आज हालात कल से सर्वथा उलट व जटिल हैं। आज सशक्त साहित्य लड़खड़ाती राजनीति को सहारा देने के बजाय या तो उसकी गोद में बैठा नज़र आता है, या प्रताड़ित व दंडित होता। कथित साहित्यकार अपने-अपने नफ़ा-नुकसान का आंकलन करते हुए विरदावली गाते दिखाई देने लगे हैं। वहीं तमाम तुकबंदी कर तंत्र के खिलाफ़ षड्यंत्र के बूते सफलता और समृद्धि तलाश रहे हैं। शिष्टता, मर्यादा व लोकशील को ताक में रख कर। अराजकता के नासूर पर चीरा लगाने वाली लेखनी दलदली दलों और नेताओं के महिमा-मंडन व खंडन में जी-जान से जुटी दिखती है। जिन्हें तयशुदा एजेंडे के तहत मीडिया-हाउस मंच मुहैया करा रहे हैं। अदबी रिसालों से मंचों तक स्वार्थपूर्ण आग्रह-पूर्वाग्रह हावी है।
तथापि अतीत के गौरवशाली पात्र व उनसे जुड़े प्रसंग आज भी घोर अंधियारे के बीच उजियारे की किरण से प्रतीत होते हैं। जो आज भी हताश जनमानस को बेहतर कल की पुनरावृत्ति बदतर आज के ख़िलाफ़ आने वाले कल में होने का दिलासा देते हैं। ऐसे प्रसंग शोधार्थियों, विद्यार्थियों के लिए भी संग्रहणीय व सम्प्रेषणीय हैं। शेष के लिए पठनीय व स्मरणीय तो हैं ही। प्रस्तुति का उद्देश्य भी यही है, जिसकी सार्थकता आपकी चेतनापूर्ण सम्मति पर निर्भर करती है। जय हिंद, वंदे मातरम।।
संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मध्यप्रदेश)