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23 Sep 2025 · 1 min read

चाह

“ना तुझे पाने की चाह
ना तुझे अपना बनाने की चाह
ना तेरे माथे पे सजी बिंदी की चाह
ना तेरे नैनों में सजे काजल की चाह
ना तेरी ज़ुल्फ़ों में उलझे झुमके की चाह
ना तेरे नथ की चमक की चाह
ना तेरी चूड़ियों की खनखन की चाह
ना तेरी पायल की झनझन की चाह
ना तेरे गालों पे सजी लाली की चाह
चाह तेरे होठों पे बसी खुशी की
चाह तेरी हँसी की गूंज की
चाह तेरे सपनों के सच हो जाने की
चाह तुझे हकीकत में जन्नत दिखाने की
चाह तुझे इस कदर हर घड़ी चाहने की”

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