परिणाम
“अपनों का आँगन अब परायों का श्मशान है…
खेली थी जहाँ अठखेलियाँ न जाने क्यों सुनसान है?
हँसी की गूंज अब कहीं गुमनाम है…
आक्रोश की अग्नि से जन्मा कोई इंतकाम है…
या बस नफ़रत का पैग़ाम है?
सिंदूर की लाली अब राख समान है…
अश्रु की धारा, चीख की गूंज – आँगन से
रणभूमि तक का परिणाम है…
क्योंकि अपनों का आँगन अब परायों का श्मशान है…
विधि का विधान है…
या अहंकार का परिणाम है?”