दिवस दूसरा आज है, आओ करें प्रणाम।
दिवस दूसरा आज है, आओ करें प्रणाम।
ब्रह्मचारिणी रूप में, माता आयी धाम।।
भजन भक्ति कर भाव से, लें माँ का आशीष।
संयम रखना सीख लें, बढ़ जाए उष्णीष।।
धवल रूप कर हृदय को, देती है माँ ज्ञान।
जिससे आदर मिल सके, करे जगत सम्मान।।
वसन श्वेत जो रख लिया, बिना लगे ही दाग।
उसका खुलता भाग्य है, यही मर्म वैराग।।
माता का इस रूप का, “पाठक” करता ध्यान।
जीवन पथ जैसा रहे, माता दे वरदान।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)