चोर-उचक्के सब रिबेल-से बने हुए थे
ग़ज़ल
नाम बग़ावत का ले-लेके झूम रहे थे
जबरे, नए जाल को लेके घूम रहे थे
चोर-उचक्के सब रिबेल-से बने हुए थे
बार-बार प्रायोजित फंदा चूम रहे थे
हत्यारे की चीखें सुन ऐसा लगता था
जैसे उसके चाकू तक मासूम रहे थे
वो जो ख़ुदको अनजाना-सा दिखा रहा था
सबको उसके सब मक़सद मालूम रहे थे
ज़्यादा बात खुली तो वो सब बोगस निकले
अपनी नज़रों में जो अब तक धूम रहे थे
-संजय ग्रोवर
( तस्वीर : संजय ग्रोवर )
जबरा=शक्तिशाली, अत्याचारी, रिबेल=विद्रोही, प्रायोजित=किसी दूसरे-तीसरे के खर्चे से किया जानेवाला काम, जिस काम के परिणाम पहले से तय कर दिए गए हों, मक़सद=उद्देश्य