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23 Sep 2025 · 2 min read

लाला जी की जीएसटी

व्यंग्य

लाला जी की जीएसटी

लाला जी अर्थशास्त्री नहीं हैं। लेकिन उनको अर्थ का पूरा शास्त्र पता है। सरकार के मन में क्या चल रहा है, वह पहले ही भांप लेते हैं। लाला जी सिर्फ लाला नहीं हैं। वह पार्टी के मेंबर भी हैं। लाला जी अपने फन में माहिर हैं। बाहर-बाहर रोते हैं। अंदर हँसते हैं। वसंत में भी उनकी आँखों से बरसात ही होती है। आमतौर पर ये सफेद सफारी पहनते हैं। इनका चेहरा बुझा बुझा रहता है। कभी ये ग्राहक को देखकर मुंह बनाते हैं। कभी मुस्कुराते हैं। कभी वेलकम करते हैं।

लाला जी की अब तीन केटेगरी हैं। ऑन लाइन लाला। ऑफ लाइन लाला। कॉरपोरेट लाला। बड़ा लाला स्कीम और ऑफर देता है। एक लाला बोनस देता है। एक सिर्फ माल बेचता है।जीएसटी तीनों पर लगती है। शुभ लाभ तीनों कमाते हैं। तीनों ही बोलते नहीं। कैसी रही दिवाली?
“कहां भाई। फुस्स। कुछ लाभ नहीं। पहले जैसा हाल। ”
एफडीआई वाले बताते हैं—बहुत भीड़ थी। हम तो मावा चेक करने गए थे। ढेर सारा मावा मिला ? नकली।

लालाजी का नाम लाला किसने रखा? कहा नहीं जा सकता। पंसारी का काम करने वाले को पहले लाला कहा जाता था। अब यह कॉरपोरेट जगत में भी पाए जाते हैं । कुछ बड़े संस्थानों में ये सीईओ होते हैं। या ऑनर। जो काम पंसारी करता है, वही ये करते हैं। सभी अर्थशास्त्र में निपुण हैं। सरकार के पास अर्थशास्त्रियों की पूरी टीम होती है जो गुणा भाग करती है।
अपने लाला जी तो अकेले हैं। दुकान पर बैठते हैं। ये दे वो दे। इधर दे। उधर दे। अपनी तिजोरी को धूप बत्ती दिखाते हैं। दिमाग में सरकार। दिल में तिजोरी। नज़र ग्राहक पर।

जैसे ही सरकार की कोई योजना आती है। उसमें ये घुन निकाल लेते हैं। जैसे गेहूं। गेहूं पिसता है। उससे आटा निकलता है। आटे से मैदा निकलती है। मैदा से ब्रेड बिस्कुट आदि आदि अनेकानेक आइटम बनते हैं। गाय और भैंस को लें। गाय और भैंस भी नहीं जानती कि
दोनों कितनी प्रतिभाशाली हैं। उनका दूध कितना कीमती है। कितने आइटम बनते हैं। दूध एक है। आइटम पर टैक्स अलग।

अब लाला जी ने गणित समझाया। तुम कविताएं कहां पर लिखते हो। डायरी में या मोबाइल में? जी, दोनों में। डायरी जीरो स्लैब में है। कागज पर 18 प्रतिशत टैक्स। बिना कागज के डायरी बनेगी क्या? तुम्हारी पुस्तक छपेगी क्या ? अब बताओ, यह बात सरकार ने सोची क्या ? नहीं न ! लालाजी के पास एक ऐसा बफर स्टॉक भी है, जो कभी खत्म नहीं होता । इसलिए बाजार में लाली है। दिवाली है।

निष्कर्ष
जीएसटी महिला ग्राहक की तरह है। उसके श्री चरण किसी दुकान पर पड़े। दुकानदार ने रेट बढ़ाए। मोलभाव हुआ। रेट घट गए। बहन जी भी खुश। लाला जी खुश।

सूर्यकांत
23.09.2028

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