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23 Sep 2025 · 1 min read

कोई तेरी ख़बर नहीं लाता

कोई तेरी ख़बर नहीं लाता
अब तो कासिद इधर नहीं आता

गुल मचा क्यूँ तुम्हारी बस्ती में
मुझको बिल्कुल समझ नहीं आता

तेरे घर की भी ख़ाक ले लेता
कोई रस्ता अगर उधर जाता

बादलों से तो तुम झगड़ बैठे
कौन रिमझिम फुहार बरसाता

नज़्म ये रूह से मुखातिब है
जिस्म का जिक्र कैसे हो पाता

ये सितारे गवाह हैं इसके
चांद खिड़की पे अब नहीं आता

मैं तिजारत कभी न कर पाया
लिखता रहता हूँ बस बही-खाता

लहर सर फोड़ती है साहिल पे
उसको सागर नहीं है समझाता

खो गई है हमारी बीनाई
हमको कुछ भी नज़र नहीं आता

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