कोई तेरी ख़बर नहीं लाता
कोई तेरी ख़बर नहीं लाता
अब तो कासिद इधर नहीं आता
गुल मचा क्यूँ तुम्हारी बस्ती में
मुझको बिल्कुल समझ नहीं आता
तेरे घर की भी ख़ाक ले लेता
कोई रस्ता अगर उधर जाता
बादलों से तो तुम झगड़ बैठे
कौन रिमझिम फुहार बरसाता
नज़्म ये रूह से मुखातिब है
जिस्म का जिक्र कैसे हो पाता
ये सितारे गवाह हैं इसके
चांद खिड़की पे अब नहीं आता
मैं तिजारत कभी न कर पाया
लिखता रहता हूँ बस बही-खाता
लहर सर फोड़ती है साहिल पे
उसको सागर नहीं है समझाता
खो गई है हमारी बीनाई
हमको कुछ भी नज़र नहीं आता