Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
22 Sep 2025 · 1 min read

गूँजे जय जयकार

प्रथम दिवस नवरात्रि का,गूँजे जय जयकार।
प्रात काल से ही लगी, मन्दिर भीड़ अपार।।
मन्दिर भीड़ अपार,खड़ी दर्शन पाने को।
गल फूलों का हार,मातु को पहनाने को।
माता के दरबार,लगा भक्तों का संगम।
सबके मन यह चाह, करें मातु दर्शन प्रथम।।

बिगड़ी बनती हैं सभी,माता के दरबार।
जग जननी वरदायिनी,देती हैं उपहार।।
देती हैं उपहार,सकल पीड़ा हर लेतीं।
भर घर के भण्डार,सुखद जीवन कर देतीं।
बनी रहे उस दास,शीश पर सदैव पगड़ी।
जिसकी दुर्गा मात, बनातीं खुद हैं बिगड़ी।।

नैना अंधे को मिलें,गूँगा गाए राग।
पंगु चढ़े झट शैल पर,धार हृदय वैराग।।
धार हृदय वैराग,नित्य जो माँ को ध्याते।
मनचाहा वरदान,जगत जननी से पाते।
रहे सदा खुशहाल,न आए दुख की रैना।
जिस पर कर दें मातु,कृपा कर अपने नैना।।

स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

Loading...