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22 Sep 2025 · 5 min read

शिक्षा,शिक्षक और शिक्षार्थी : पतन का सिलसिला (Education, teachers and learners: A cycle of decline)

आज वो लोग भी धड़ाधड़ शिक्षक दिवस की शुभकामनाओं के संदेश भेज रहे हैं जो सुबह, दोपहर,शाम और रात को ऐसे संगठन के लालबुझक्कडों के सामने नतमस्तक रहते हैं, जिस संगठन ने शिक्षक, गुरु और आचार्य -इन तीनों की गरिमा,महिमा और प्रतिमा को बेइज्जत करने,तार तार करने, सरेआम नीलाम करने, सस्ते में खरीद -फरोख्त करने, गुलाम बनाने तथा बंधुआ मजदूरी में बदलने में कोई कोर -कसर नहीं छोड़ रखी है।जब तक ऐसे धूर्त, स्वार्थी और दास वृत्ति के शिक्षक मौजूद हैं,तब तक प्रतिभाशाली और योग शिक्षक का तो हित होगा ही नहीं, इसके साथ शिक्षा और विद्यार्थी का भी भला नहीं हो पायेगा। ऐसे दास वृत्ति के गुलाम शिक्षक शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देने के लिये कुछ ज्यादा ही जोर आजमाइश कर रहे हैं।वो शिक्षक जो प्रतिभाशाली हैं,योग्य हैं, मेहनती हैं; वो बेचारे असमंजस में हैं कि शुभकामनाएं खुशी की दें या अपने खुद के शोषण और गुलामी की दें।आज का दिन शुभकामनाएं देने का नहीं अपितु अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिये चिंतन,मनन और कार्रवाई करने का है। ऐसे शोषित शिक्षकों के लिये आज का दिन शोक दिवस,शोषण दिवस, गुलामी दिवस आदि होना चाहिये। आखिर ग़ुलाम,दास और शोषित लोग किस खुशी में शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं प्रेषित कर रहे हैं। शिक्षा ने जिन लोगों को सिर्फ बदहाली, गरीबी, अभाव, उपेक्षा, छुआछूत, दासता, गुलामी आदि के कलंक प्रदान किये हैं,वो शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं क्यों दे?
निष्ठावान,परिश्रमी,योग्य और प्रतिभाशाली शिक्षक कभी किसी से सम्मान की मांग नहीं करते हैं। इसके साथ यह भी सच है कि जिन शिक्षकों में कोई चारित्रिक, शैक्षणिक या अन्य कमी होती है,वो शिक्षक सम्मान पाने के लिये बहुत जद्दोजहद करते देखे जाते हैं। लगभग तो यह देखने में आता है कि योग्य शिक्षकों को सम्मान मिलना अपवादस्वरूप होता है। कभी कोई भूला -भटका विद्यार्थी या छात्र या संगठन या अकादमी या शिक्षा- संस्थान उसको सम्मानित करके अपने सिर से यह कलंक मिटा लेने का प्रयास करते हैं कि ‘वो शिक्षक का सम्मान नहीं करते’।हमारे सिस्टम में शिक्षक की योग्यता, उसके परिश्रम, उसकी प्रतिभा से अधिक सम्मान चापलूसी करने, गुलामी करने, हां जी -हां जी करने को मिलता है। पुरस्कार देना एक ढोंग मात्र है।कुछ अपवादों को छोड़कर ये शिक्षक पुरस्कार आदि सदैव ही किसी ने किसी जुगाड, चापलूसी, सिफारिश,जान पहचान आदि से मिलते हैं।
समकालीन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुये योग्य,भले, अच्छे और सफल शिक्षक उन्हीं को कहा जा सकता है जिनके पास अपने विद्यार्थियों को देने के लिये मूलभूत डिग्री के कौशल के साथ तकनीकी कौशल, जीवन-मूल्य कौशल और ध्यान कौशल मौजूद हो। लेकिन हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था तो नकल या सिफारिश के द्वारा केवल उपाधियां प्रदान करने, लिपिक और मुनिम तैयार करने,सस्ते अकुशल मजदूर तैयार करने तक सीमित है। प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक,स्नातक, स्नातकोत्तर और यहां तक कि पीएचडी आदि में भी यही प्रवृत्ति विद्यमान है। बच्चों में प्राकृतिक रूप से मौजूद विभिन्न प्रकार की वैज्ञानिक,तकनीकी, तार्किक, वैचारिक,नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और ध्यान की क्षमता को अभिव्यक्ति देने की हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। होना तो यह चाहिये कि शिक्षक, नेता, वैज्ञानिक, तार्किक, दार्शनिक,विचारक, साहित्यकार, व्यापारी आदि को तैयार करने के लिये अलग अलग विश्वविद्यालय होने चाहियें। प्राथमिक स्तर की शिक्षा से ही बच्चों में प्राकृतिक रूप से मौजूद योग्यता की पहचान करके उनको अलग-अलग विश्वविद्यालयों में शिक्षा देने की व्यवस्था होनी चाहिये। लेकिन जिस सिस्टम को सिर्फ गुलामों, दासों, सस्ते मजदूरों, रैलियों में भीड़ जुटाने वाले अंधभक्त मंदबुद्धियों की जरूरत हो,वो सिस्टम ऐसी सृजनात्मक शिक्षा की व्यवस्था देने के लिये ऐसे विश्वविद्यालय क्यों खोलेगा? सैकड़ों हजारों करोड़ खर्च करके विभिन्न राजनीतिक दलों के पांच-सितारा कार्यालय खुल सकते हैं लेकिन अच्छे विश्वविद्यालय नहीं खुल सकते। ध्यान रहे कि अच्छी शिक्षा,अच्छे विश्वविद्यालय और अच्छे शिक्षक सदैव ही भ्रष्ट सिस्टम, भ्रष्ट व्यवस्था, भ्रष्ट नीति- निर्माताओं ,शोषक धर्मगुरुओं, अय्याश सुधारकों, स्वार्थी पूंजीपतियों और भ्रष्ट नेताओं का विरोध करने वाले विद्यार्थी और शिक्षक तैयार करेंगे। चापलूसी,जी हुजूरी, सिफारिश और नेताओं की धींगामुश्ती वहां पर काम नहीं आयेगी। लेकिन हमारे यहां तो ऐसा कुछ है ही नहीं।शिक्षक दिवस पर शुभकामनाएं देने से पहले इस पर चिंतन,मनन और आचरण सुधार की चर्चा होना चाहिये।
जिस राष्ट्र का सिस्टम शैक्षणिक संस्थानों को अच्छे शिक्षक,पूरे शिक्षक,भवन,पुस्तकालय, प्रयोगशाला,पार्क,उद्यान, वैचारिक स्वतन्त्रता, तार्किक विश्लेषण और दार्शनिक विवेक देने समर्थ नहीं है,वह सिस्टम कभी भी उस राष्ट्र को विकसित, समृद्ध और खुशहाल नहीं बना सकता।
आजादी से पहले हम अंग्रेजी शिक्षा को भारत के पतन का कारण मानते थे, कुछ बेवकूफों कै छोड़कर। लेकिन सन् 1947 ईस्वी के पश्चात् तो भारतीय संविधान लागू है। हमारी पूरी शिक्षा,दीक्षा,परीक्षा आदि भारतीय संविधान के अनुसार हो रही है। फिर पिछले 75 वर्षों में हम वहीं के वहीं क्यों खड़े हैं? विभिन्न राष्ट्रों ने अपने बलबूते पर अपनी स्वयं की तकनीक, शिक्षा, प्रोद्योगिकी, भाषा और मूल्यों के द्वारा अपने अपने राष्ट्रों को विकसित राष्ट्र बना दिया है। लेकिन हम आज भी अपनी आवश्यकता की हरेक तकनीक,वस्तु प्रोद्योगिकी,ईंधन , खाद्य तेल, हथियार,रणनीति,ज्ञान आदि विदेशों से आयात कर रहे हैं। कितने शर्म की बात है यह। भारत को विश्वगुरु और विश्व महाशक्ति बनाने के नारे लगाने वाले नेताओं को शर्म नाम की कोई वस्तु कभी रही ही नहीं है। कोई राष्ट्र कभी भी आयातित तकनीक,ज्ञान, प्रोद्योगिकी, शिक्षा -पद्धति, विदेशी भाषा और जीवन-मूल्यों के बल पर विश्व महाशक्ति, विश्वगुरु, समृद्ध और खुशहाल नहीं बन सकता है। हवाई जहाज,लड़ाकू विमान,टैंक,राईफल ,पिस्टल,तोप, राडार सिस्टम,मिसाईल,ड्रोन,कंप्यूटर,
मोबाइल,भारी मशीनरी आदि को छोड़िये; भारत तो चीन से खिलौने, गुड़िया,पतंग,कपड़े,रस्सी,जूते,टाफी,
रेजर,ट्रीमर तक आयात कर रहा है।यह सब अनहोनी हमारे राजनीतिक सिस्टम और शैक्षिक सिस्टम की घोर विफलता का परिणाम है।
शिक्षा देने में कमियां, शिक्षा नीति में कमियां, शिक्षा पद्धति में कमियां, शोध कार्य में कमियां और शिक्षा के बाद रोजगार उपलब्ध नहीं पाने में कमियां – आदि से भारतीय शिक्षा शुरू से ही लदी हुई है। और तो और शिक्षा जगत् में जिन शिक्षकों को विभिन्न पुरस्कार आदि मिलते हैं उनका निर्धारण भी विवादित और भाई-भतीजावाद से लबालब भरा हुआ होता है। इनमें भी सैटिंग, खींचातानी, लेन-देन, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक पहुंच,सौंदर्य आदि का बोलबाला रहता है। कोई विरोध करेगा तथा उसका विरोध सबके सामने आ जायेगा तो फिर उसकी खैर नहीं है। हमारे यहां तो हालत इतनी बड़ी गली हो चुकी है कि जिनके सम्मान स्वरूप शिक्षक दिवस मनाया जाता है,उस व्यक्ति पर भी साहित्यिक, वैचारिक और दार्शनिक चोरी करने के आरोप लगे हैं। भारत वास्तव में ही एक विचित्रताओं से भरा हुआ विचित्र राष्ट्र है।
भारतीय विश्वविद्यालयों की रैंकिंग दुनिया के विश्वविद्यालयों में कहां पर है? हमारी सड़ी,गली,दुषित और आयातित शिक्षा पद्धति और सोच ने हमें इतना नीचे गिरा दिया है कि हमारे विश्वविद्यालय दुनिया के प्रथम 500 विश्वविद्यालयों में भी अपना स्थान नहीं बना पाते हैं।हमारा सिस्टम शिक्षा के बजट को लगातार कम करता जा रहा है।हमारा शिक्षा बजट पहले ही बहुत कम है, लेकिन नासमझ नेता और उनके मार्गदर्शक मंडल के निर्देश पर इसे और भी कम किया जा रहा है ताकि सिस्टम के उद्योगपति मित्रों को सस्ते बंधुआ मजदूर आसानी से उपलब्ध हो सकें। बेरोजगारी देने वाली इस शिक्षा से तंग होकर भारतीय युवा युरोप और अमरीका भागे जा रहे हैं। वहां पर पढाई हो या ना हो, लेकिन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये रोजगार मिल ही जाता है।
…………
आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

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