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22 Sep 2025 · 6 min read

'दर्शनशास्त्र' के परिप्रेक्ष्य में 'भारतीय ज्ञान प्रणाली' पर प्रश्नचिन्ह (Question mark on 'Indian knowledge system' in the perspective of 'Philosophy')

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लगभग 1300 वर्षों की विदेशी अब्राहमिक दासता ने भारत की स्थिति को उलझनों और विरोधाभासों से भर दिया है। इसके दुष्प्रभाव वश पिछले 150 वर्षों के काल में राधास्वामी,ब्रह्माकुमारीज,इस्कान,
सांई बाबा,गायत्री परिवार,सच्चा सौदा, तत्वदर्शी रामपाल,नारायण, पतंजलि योगपीठ आदि जैसे सैकड़ों संगठन सनातन धर्म ,संस्कृति , अध्यात्म और योगाभ्यास की आड़ में खड़े हो गये हैं। इनके संस्थापकों ने सनातन धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों का अध्ययन,अध्यापन और शोधादि कार्य किया हुआ नहीं होता है।बस,ये कुछ बातों को सनातन धर्म के ग्रंथों से निकालकर उनमें कुछ अपनी तरफ से जोड़ देते हैं। शास्त्रों के अर्थ को तोड़-मरोड़कर तथा कुछ अनाप-शनाप अपनी तरफ से मिलाकर ये उसी का उपदेश करने लगते हैं। जनसाधारण को इतनी समझ तो होती नहीं है तथा कुछ कयी सदी की गुलामी का प्रभाव होता है। इसके कारण जनसाधारण इन्हीं की शिक्षाओं को सनातन धर्म और संस्कृति मानकर चलने लगती है। प्रसिद्धि,धन- दौलत के स्वार्थ, पद के लालच तथा अनुयायियों की भीड़ बढ़ाने के मोह में फंसकर ये तथाकथित सांप्रदायिक गुरु,संत और कथाकार स्वयं को ही भगवान् मानकर पूजा करवाना शुरू कर देते हैं।एक समय आता है कि इनके अनुयायी सनातन के ही विरोधी हो जाते हैं। ऐसे लोगों ने ब्रह्मा,विष्णु,शिव, पार्वती,श्रीराम,हनुमान,श्रीकृष्ण, पतंजलि,दुर्गा,
भैरव,काली,शंकराचार्य,कबीर, ओशो फाउंडेशन, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन और नवबौद्ध आदि के नाम पर अपने अपने संप्रदाय खड़े कर दिये हैं। सनातन भारतीय दर्शनशास्त्र की वैचारिक स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करके ये सनातन धर्म और संस्कृति को ही खोखला करने का काम कर रहे हैं। इनके ऊपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। पिछले सात दशकों के कार्यकाल में इन्होंने भारतीय संविधान प्रदत्त मजहबी स्वतंत्रता की आड़ में खूब मनमानी की है। वैज्ञानिक और तकनीकी तरक्की करने भौतिक विकास हेतु अत्यावश्यक है लेकिन अपनी जमीन से जुड़े हुये जीवनमूल्यों का अपमान और उपेक्षा करके यह नहीं किया जाना चाहिये। हमारे यहां का राजनीतिक सिस्टम भी सनातन धर्म और संस्कृति के विरोध में उठी हरेक आवाज को वैचारिक और मजहबी स्वतंत्रता कहता है लेकिन सनातन धर्मियों को इनका विरोध करने तथा अपने सनातनी जीवन-मूल्यों की रक्षा करने का कोई अधिकार नहीं देता है। बड़ी हास्यास्पद स्थिति चरम पर है।कौन क्या कहे?
जोरोस्ट्रियनवादी अब्राहमिक सभी मजहबों के अनुयायी भौतिक तरक्की के साथ अपने -अपने मजहबों के जीवन-मूल्यों और पूजा-पाठ की तरक्की के लिये सतत् लगे रहते हैं, जबकि सनातनधर्मी को ऐसा बना दिया गया है कि वह ज्यों ज्यों पढा लिखा होता जाता है,वह सर्वप्रथम सनातन धर्म संस्कृति को ही गालियां देने लगता है। आज से चार हजार वर्षों पहले ईरान में वेदों की शिक्षाओं को विकृत करके जरथुष्ट्र द्वारा तैयार जेंद -अवेस्ता ग्रंथ के आधार पर सभी अब्राहमिक मजहब आज भी अपने- अपने पवित्र ग्रंथों को अवैज्ञानिक होते हुये भी पहले जितना ही सम्मान देते आ रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ़ सनातन धर्म,संस्कृति, सभ्यता,दर्शनशास्त्र और जीवन मूल्यों तथा सर्वाधिक पुरातन और वैज्ञानिक ग्रंथों वेद,आरण्यक, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र,आयुर्वेद, ज्योतिष,गणित, महाकाव्य,कृषि, शिक्षा आदि के ग्रंथों को पाखंड कहकर हीन दृष्टि से देखा जाता है।यह ठीक नहीं है।
पिछले पांच सात वर्षों से नयी शिक्षा नीति का शोर मचाया जा रहा है। इसमें हरेक स्तर पर सनातन भारतीय ज्ञान प्रणाली को पढाये जाने की बात की जा रही है। लेकिन इसके लिये जो पाठ्यक्रम तथा पाठ्यक्रम के अनुसार पुस्तकें तैयार की गई हैं, दोनों में अधकचरी जानकारियों की भरमार है। क्योंकि आजादी के सात दशक पश्चात् भी उच्च शिक्षा, शासन, प्रशासन और नीति निर्धारण के स्तर पर मैकालयी, साम्यवादी और नवबौद्ध मत की पूर्वाग्रहग्रस्त और संकीर्ण सोच प्रभावी है, इसलिये अब भी भारतीय ज्ञान प्रणाली के पाठ्यक्रम और निर्धारित पुस्तकों के स्तर से भारत और भारतीयता के प्रति हीनता की दुर्गंध आ रही है।इस पूरी प्रक्रिया पर संघी पौराणिक,मैकालेवादी,साम्यवादी और नवबौद्ध सोच का दुष्प्रचार मौजूद है। हजारों वर्षों से सतत् मौजूद सनातन भारतीय धर्म,संस्कृति, दर्शनशास्त्र, योग,अध्यात्म, आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित ,कृषि , धातुविज्ञान, समुद्र विज्ञान, यज्ञ विज्ञान, युद्ध विज्ञान,व्यापार आदि के संबंध में सतही और आधी-अधूरी जानकारी दी गई हैं।भारत के जिन विश्वविद्यालयों में नई शिक्षा नीति के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली विषय को लागू किया है; वहां की हालत, पाठ्यक्रम, पुस्तकों, कक्षाओं और शिक्षकों की अयोग्यता हास्यास्पद है।हरेक स्तर पर नाम कमाने के चक्कर में सिर्फ ऊटपटांग कुछ भी अनाप-शनाप किया जा रहा है।पूरे प्रकरण में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति किसी अयोग्य,अनपढ़, बेवकूफ और अंधभक्त को दे रखी है।इसे भारतीय ज्ञान प्रणाली की जगह भारतीय अज्ञान प्रणाली कहना ठीक होगा। निष्पक्ष,तार्किक और विषय विशेषज्ञ आधिकारिक विद्वानों की कमी हरेक स्तर पर दिखाई पड़ रही है।
‘अप्पो दीपो भव’। यहां ध्यान देने की बात यह है कि यदि किसी के लिये अपना दीपक खुद बनना संभव होता तो सिद्धार्थ यह बात भी किसी से नहीं कहते।सब अपना दीपक खुद बन जायेंगे। और यदि नहीं बन पाते हैं तो यह कथन ही ग़लत है। और तो और खुद सिद्धार्थ गौतम भी अपना दीपक खुद नहीं बन पाये थे,उनको भी सांख्य और योग के आचार्यों के पास रहकर छह वर्षों तक योगाभ्यास करना पड़ा था।इस बात को सिद्धार्थ गौतम तो मानते थे लेकिन बाद के बौद्ध विचारकों ने उनकी बातों को छिपा दिया। खुद सिद्धार्थ गौतम छह वर्षों तक गुरुओं के मार्गदर्शन में योगाभ्यास करने के पश्चात् यह कहने में योग्य हुये थे कि अप्पो दीपो भव। फिर किसी भी प्रकार के योगाभ्यास से अनजान जनसाधारण को यह सीख क्यों पिलाई जा रही है कि अपना दीपक खुद बनो।जिस काम को खुद सिद्धार्थ गौतम तक संभव नहीं कर पाये, उसके साधारण व्यक्ति कैसे कर पायेगा? और यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि अपना दीपक खुद बनने का उपदेश किस संदर्भ में दिया जा रहा था – सांसारिक, भौतिक, मानसिक, वैचारिक, भावनात्मक, आत्मिक या अन्य किसी संदर्भ में?सच यह है कि इस प्रकार की सीख प्रबुद्धता के चरम पर पहुंचे साधकों हेतु होती है लेकिन यह सीख जनसाधारण को दी जा रही है।वो सुधरने की बजाय बिगड़ते जा रहे हैं। खुद अपना दीपक बनने की सीख बुद्ध से हजारों वर्षों पहले वेदों,उपनिषदों और योगसूत्र में भी मौजूद है।आज भारत में जो लोग अपने आपको बौद्ध मत का अनुयायी बतलाते हैं,वो स्वयं इस सीख को अपने आचरण में क्यों नहीं उतार रहे हैं? उन्हें क्यों नये प्रकार की वर्ण-व्यवस्था को भेदभावपूर्ण ढंग से लागू करके अपना जीवन यापन करना पड़ रहा है?
बृहस्पति,जैन, वैभाषिक,सौत्रांतिक,योगाचार, शून्यवाद – इन छह को नास्तिक कहा जाता है। सिद्धार्थ बुद्ध की आड़ लेकर बनाये गये चार दर्शनशास्त्र एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत और विरोधी हैं।इनको एक ही दर्शनशास्त्र कहना बिल्कुल गलत है।इन छहों नास्तिक और निरीश्वरवादी कहे जाने वाले दर्शनशास्त्रों के मूल प्रवक्ता सनातन आर्य वैदिक ही थे।
इनके मूल प्रवक्ताओं ने तत्कालीन विकृत धार्मिक,आध्यात्मिक,नैतिक परिस्थितियों में सुधार करने के निमित्त ही अपनी बातों को जनता जनार्दन के सामने रखा था।
ये समस्त ब्रह्माण्ड अस्तित्व का स्पंदन मात्र है।एक सत्ता या अस्तित्व या होना या परमात्मा सर्वत्र वर्तमान है।यह सर्व- सृष्टि उसी का स्थूल स्पंदन मात्र है। संसार की प्रत्येक वस्तु एक स्पंदन मात्र ही है। सभी स्पंदन भिन्न भिन्न प्रकार के हैं।इस भिन्नता से ही वस्तुओं का अलग अलग होना निश्चित होता है। स्पंदन का शुरू होना सृष्टि है और स्पंदन का शांत हो जाना प्रलय है।यह सतत् चलायमान है। जो दर्शनशास्त्र स्पंदन पर ही रुक गये तथा उनके मूल में मौजूद सत्ता तक नहीं पहुंचे, उन्होंने अपने -अपने भौतिकवादी,नास्तिक, निरीश्वरवादी दर्शनशास्त्र बना लिये। लेकिन जो इन स्पंदनों के मूल तक चले गये वो सभी अध्यात्मवादी, आस्तिक और ईश्ववरवादी कहलाये तथा उन्होंने अपने अपने दर्शनशास्त्र भी वैसे ही निर्मित कर लिये। भारत में पहले वाली श्रेणी के शुरुआती दार्शनिकों ने सत्ता के केवल बाहरी भौतिकवादी स्वरूप का इसलिये समर्थन किया था क्योंकि सत्ता के मूल आध्यात्मिक स्वरूप की आड़ लेकर कुछ धूर्त लोगों ने जनमानस का शोषण करना शुरू कर दिया था। इनके बाद में जो दार्शनिक आये वो स्वयं शोषक बन गये तथा उन्होंने अपनी दुकानदारी चलाने के लिये सत्ता के बाहरी भौतिकवादी स्वरूप को ही अंतिम सत्य मानकर सत्ता की मूल आध्यात्मिक स्वरूप का खंडन करना शुरू कर दिया।भारत में जितने भी नास्तिक दर्शनशास्त्र हैं वो सभी इसी श्रेणी में आते हैं।
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आचार्य शीलक राम
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119

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