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22 Sep 2025 · 4 min read

पांच कविताएं

1
भावी पीढ़ियों के लिए…
चलो कुछ ऐसे फूल उगाते हैं
जिनकी सुगंध
बारूद की गंध को जज्ब कर ले
और सुगंध ही सुगंध बिखर जाए
उपवन के ओर छोर।

फूलों के सुर्ख रंग जीवन के
रंगों में
घुल मिल जाएं इस तरह
जैसे तितलियों के पंखों पर बिखर आते हैं
कई रंग ।

भंवरों फूलों कलियों तितलियों
का प्रेम सौहार्द
फूलों की मिठास में घुल मिल जाता है
शहद बनकर ।

कुछ सपने बुनें
भावी पीढ़ियों के लिए जिनमें
महकती हुई फिजाएं हों प्रेम भरी
घटाएं हों।

अजान और घंटियों की ध्वनियां
घुल मिल जाएं
कोई भी मजहब इंसानियत पर भारी न पड़े
धर्म की पोथियों में लिखें
प्रेम भरे शब्दों को सौहार्द की जमीन पर
खड़े होकर सब पढ़ें ।

नफरत के रंगों से कोई भी
अपवित्र न कर पाए समाज की
खूबसूरत तस्वीर
हमेशा बहता रहे मोहब्बत की नदियों में
प्रेम सौहार्द का नीर ।

भावी पीढ़ियों के लिए हम रच कर जाएं
उड़ान भरा क्षितिज
सत्यम शिवम सुंदरम भरा संसार ।

2

जिंदगी का सच….
तपती हुई रेत थी और
पांव नंगे
मीलों चलना था
दूर दूर तक कोई साया
नहीं था ।

तन्हा तन्हा रास्ते
कदम कदम झुलसन
बस हिम्मत थी भीतर
संघर्ष को स्वीकारने की ।

गहरी खाईयों को
लांघना था लंबी छलांग से
छलांग लगाई भी और
खाईयां लांघी भी ।

यही सोचकर चलता रहा कि
किसी दिन
संघर्ष का यह सफर
तय हो ही जाएगा ।

पर यह क्या
न सफर तय हुआ
न तन्हा रास्ते खत्म हुए
न तपती रेत की झुलसन ।

अब भी नंगे पांव
सफर जारी है
सोचता हूं कभी-कभी
क्या यही जिंदगी का सच है…।।

3
इस दौर में ….
इस दौर में रिश्तों की नैसर्गिक सुगंध
स्वार्थ की धूप में उड़ गयी है
अब आंगन आंगन बहेलिये जाल बिछाये बैठे हैं
बेचारी चिड़ियाँ फुदकें तो कंहाँ फुदकें ।

अंधे रेवडियाँ बांटने में इस तरह व्यस्त हैं कि
मुड-मुड कर अपने को ही देने में लगे हैं
छल की जमीन पर उगते आश्वासन
मृगतृष्णा में भटकाने पर उतारू हैं ।

गुलिस्तां के पेड़ों पर बैठे उल्लू
गुलिस्तां को उजाड़ने ही नहीं उसकी आबरू
बेचने पर आमदा हैं ।

जुगनुओं ने अंधेरों से सांठगांठ कर ली है
डिग्रियों से भरे थैले लिये युवा भटक कर
पगडंडियों की तरफ मुड़ने लगे हैं।

मकानों का क्षेत्रफल बढने के बावजूद
लोगों के दिल सिकुड़ने लगे हैं
आम आदमी की लाचारी आंकड़ों की भेंट
चढ़ने लगी है ।

मिलावट ने आहार से विचार तक अपना कब्ज़ा
जमा लिया है
आम आदमी अपने सवालों का अस्थि पिंजर लिये
चौराहे पर खड़ा है ।

मंजिल के मील पत्थर भ्रष्टाचार से पुते हैं
भविष्य की धुंधली तस्वीर को आँखों से गुजारते
आम आदमी डरने लगा है ।

इतना सब होने के बावजूद
आस की डोर टूटी नहीं है एक न एक दिन
जरुर कोई मसीहा पैदा हो ही जाएगा
युग परिवर्तन की मशाल लेकर आ ही जाएगा
उजाला फैला ही जाएगा ।

इसलिए जहरीली हवाओं के बीच भी
हमारे अंदर का सुखद संभावनाओं का पेड़ जिन्दा है
आस की जमीन पर
इन झंझावातों से जूझता-लड़ता हुआ भी ….।

4

जीवन गीत.. (कविता)

इस सृष्टि पर उसका गुंथा
जीवन एक ऐसा गीत है
जिसे सबको गाना पड़ता है
कोई इसे सुर में गा लेता है और कोई
बेसुरा ।

किसी को संगतकार मिल जाते हैं
और उसकी टूटती हेक को
संगतकार संभाल लेते हैं
और वह इस गीत को बखूबी गा लेता है
और वाहवाही भी बटोर लेता है।

परदा गिरने के बाद भी
उसके सुरों की दुनिया तारीफ
करती है
उसकी शान में कसीदे गढ़ती है ।

गाना तो उसे भी पड़ता है
जिसे अच्छे संगतकार नहीं मिलते
उसकी टूटती हेक को
संभालने वाले
उसके सुर में सुर मिलाने वाले ।

बेशक पर्दा गिरने के बाद
लोग उसे जल्दी भूल जाते हैं
वाहवाही उसके हिस्से
नहीं आती।

फिर भी जीवन गीत अनवरत
गूंथती रहती है सृष्टि
और गाने वाले आते जाते रहते हैं ।

5

जिंदगी….
चलो उठो काम करो चलना है जिंदगी।
धूप -छांव- बारिशों में पलना है जिंदगी ।।

जीवन के रंगों से न करो इंकार तुम ।
फूल मिलें शूल मिलें करो स्वीकार तुम ।।
सब स्वीकार करो जीत और हार तुम ।
दिल में जलाए रखो धैर्य के अंगार तुम ।।
पल – पल युद्ध जैसे लड़ना है जिंदगी ।
धूप -छांव – बारिशों में पलना है जिंदगी।।

चार-पल दुख के जो आए तो न डरना ।
पस्त निज हौसलों को यूं न कभी करना।।
अपने दिलों में कभी भय को न भरना ।
टूटे हुए पंखों को न देखकर डरना ।।
हौसलों के बूते ऊंचे उड़ना है जिंदगी।
धूप- छांव – बारिशों में पलना है जिंदगी ।।

नजरें उठाओ देखो खिले हुए फूल हैं ।
उनकी हिफाज़तों में लगे हुए शूल हैं ।।
एक धरती पे उगे आम व बबूल हैं।
वही सुखी दुनिया में जिसे ये कबूल हैं ।।
घने अंधियारों में भी जलना है जिंदगी ।
धूप -छांव – बारिशों में पलना है जिंदगी ।।

जीवन को जोहड़ न बनाना तुम दोस्तों ।
दुख भरे गीत न सुनाना तुम दोस्तों ।।
कठपुतली सा न नचाना तुम दोस्तों ।
घृणा – विष इसे न पिलाना तुम दोस्तों ।।
नदिया सा सांए सांए चलना है जिंदगी ।
धूप- छांव -बारिशों में पलना है जिंदगी।।
अशोक दर्द

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