दोहा सप्तक. . . . संबंध
दोहा सप्तक. . . . संबंध
हुआ दिखावा मात्र अब, रिश्तों में व्यवहार ।
नाम मात्र का रह गया, अब आपस का प्यार ।।
आपस के माधुर्य को, हरते कड़वे बोल ।
ऐसे अवसर का कड़ा, पड़े चुकाना मोल ।।
जितना संभव टालिए, संबंधों में तर्क ।
टूटे से फिर कब जुड़ें, रिश्तों में सम्पर्क ।।
मुश्किल में होता सदा, संबंधों का मोल ।
आडम्बर का फैंकिये, अपने मन से खोल ।।
बढ़ें प्रेम से प्रेम के, रिश्तों में संवाद ।
खा जाती है प्रेम को, नफरत भरी मवाद ।।
रिश्तों में व्यवहार ही, मधुर प्रेम आधार ।
थोड़ी सी बस नम्रता, करती दूर विकार ।।
छोटी-छोटी बात पर, अच्छी नहीं खटास ।
मनमुटाव से शूल सम, मन में हो संत्रास ।।
सुशील सरना / 22-9-25