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22 Sep 2025 · 7 min read

दस कविताएं

1
मैं सोचता हूं…
पश्चिमी सभ्यता की दहलीज पर बैठा हुआ
पूर्व का यह आदमी
भीतर जो कभी भरा पूरा हुआ करता था
एकदम खाली कैसे हो गया
उसके भीतर से पुरखों का रक्त सूख गया
या उसके भीतर कोई
मोहभंग का विषैला पौधा उग आया।

आज वह जिस तरह खोखली चकाचौंध को
दोनों हाथों से बटोरने में लगा है
लगता है उसे न तो पुरखों की हिदायतों का
निर्मल जल मिला है
और न ही संस्कारों की छांव।

वह अपने पुरखों के सारे आदर्श
आज फिर ताक पर रखकर आ गया है
इस अनचाही दहलीज पर जहां भौतिकवाद
अतृप्त वासनाएं अंजलि भर भर कर बांट रहा है।

आदमी की झोली भर जाने के बाद भी ये अतृप्त
वासनाएं पूरा होने का नाम नहीं लेतीं
और भीतर से यह खोखला आदमी
भरा पूरा होने के लिए
न जाने कितनी बैसाखियां कंधे पर उठाए
दर-दर भटक रहा है।

उसे अपने पुरखों की याद क्यों नहीं आती
उनकी नसीहतें अब उसके काम क्यों नहीं आती
सिद्धांतों से भरी भारी भरकम पोथियां
उसका इस अतृप्त भटकन में मार्गदर्शन क्यों नहीं करतीं
मैं सोचता हूं आदमी के इस भीतरी खोखलेपन पर
कोई कविता क्यों नहीं लिखता….।
2
खूबसूरत कविताएँ….
कुछ कविताएँ
बड़ी खूबसूरत होती हैं
जिनमें दुनिया के तमाम प्रपंचों के लिएजगह नहीं होती
वे जल्दी ही दिलों की गहराइयों में
उतर जाती हैं।

जैसे बच्चों की खूबसूरत मीठी तोतली बातें
जिनकी पहुँच में व्याकरण नहीं होता
जिनकी भाषा में कोई छद्म नहीं होता
अन्तस् निर्मलता से परिपूर्ण।

एक अन्तस् से दूसरे अन्तस् तक की
यात्रा में
कोई अवरोध नहीं होता
सचमुच अमूल्य होती हैं ऐसी कविताएँ।

निश्चय ही ये कविताएँ भी
खूबसूरत बच्चों की तरह
सहेजी जानी चाहिए।

इस खूबसूरत दुनिया की
खूबसूरती बचाने के लिए …।।

3
मैंने देखा है …
उम्र के साथ-साथ सपनों का रंग
भी बदल जाता है
जैसे वासंती रुत के हरे पत्तों का रंग
खिजां तक आते आते ज़र्द हो जाता है।

मैंने देखा है….
धानी धानी सपने कब काले
पड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता।
बहकती महकती आंखों पर कब जाले
पड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता ।।

मैंने देखा है ….
नीला खूबसूरत आसमान
महकती हुई सतरंगी हवाएं
खूबसूरत आभा लिए दमकते सितारे
एक समय के बाद धूमिल पड़ जाते हैं।

मैंने देखा है ….
बहती छलछलाती हुई
नदियों को
टुकड़ों में बंटते हुए और फिर
बूंद बूंद सूखते खरामा खरामा।

मैंने देखा है…
खूबसूरत तस्वीरों को भी
समय की चौखट पर इंतजार में
अपनी आभा को खोते हुए बेरंग होते हुए ।

मैंने देखा है…..
इस अंतहीन चक्र में
हर रोज पिस रहा है कुछ न कुछ
गाहे वगाहे चाहे अनचाहे
मैं तुम और वह या यूं कहो
सब कुछ…।।( 23-12-23)

4
गीत…..
यह उदास तन्हा शाम और ये दिल दुखातीं तन्हाईयां।
जब दिल में ही जो सकून नहीं तो क्या करेंगी अमराईयां।।

जब धूप – छांव के दिन फिरे और हम अंधेरों से घिरे।
इन पलकों पे जो बिठाए थे वो वफ़ा की नजरों से गिरे।।
फिर छोड़कर चलतीं बनीं सब साथ की परछाईयां।।
जब दिल में ही जो सकून नहीं तो क्या करेंगी अमराईयां।।

जब खिजां में पत्ते झड़ गए और सारे भंवरे उड़ गए ।
फिर उजड़े दयार को देख कर आते परिंदे मुड़ गए।।
अब तुम ही बताओ दोस्तों हम क्या करें पुरवाइयां।।
जब दिल में ही जो सकूं नहीं तो क्या करेंगी अमराईयां।।

यहां धूप – छांव में बैठकर रिश्तों की बुनी थीं जो चादरें ।
वो सारी की सारी उधड़ी मिलीं अब क्या संभालें क्या करें।।
दर्द उधड़ी हुई इन चादरों की अब कैसे करें तुरपाईयां ।
जब दिल में ही जो सकून नहीं तो क्या करेंगी अमराईयां।।

5
अपना सामान बांध बटोही….
अपना सामां बांध बटोही सांझ हुई चल घर चलते हैं।
कल आया तो कल देखेंगे सांझ हुई चल घर चलते हैं।।

छोड़ दे अब तू गणित लगाना ,झूठ मूठ का मन बहलाना।
जो दिखता है सब नश्वर है, नश्वर है सब खोना – पाना ।।
ये राग द्वेष खुद मिट जाएंगे, भीतर जो भी पलते हैं ।
कल आया तो कल देखेंगे सांझ हुई चल घर चलते हैं।।

कलियां पुष्प जो टहक रहे थे, खुशबू से जो महक रहे थे।
भंवरों के संग चहक रहे थे , जो मस्ती में बहक रहे थे ।।
ये भी सांझ के होते-होते, अपना रंग बदलते हैं।
कल आया तो कल देखेंगे सांझ हुई चल घर चलते हैं।।

इस नगरी में दिल क्या लगाना, चलता रहेगा आना जाना।
जगत सराय रेन बसेरा , सुबह मुसाफिर होगा जाना ।।
बिछड़ गए तो पुनः मुसाफिर ,इस नगरी कब मिलते हैं।
कल आया तो कल देखेंगे सांझ हुई चल घर चलते हैं।।

आर्त बनकर जग के आगे , कभी नहीं तुम हाथ पसारो ।
खुद को दीन बनाकर बंधु , कुछ पाने को जगत निहारो ।।
स्वर वेदना के सुनकर भी, पत्थर नहीं पिघलते हैं ।
कल आया तो कल देखेंगे , सांझ हुई चल घर चलते हैं।।

सुबह से लेकर शाम तलक, यह जीवन सुख दुख ढोता है।
मौसम मौसम के संग चलता, कभी हंसता कभी रोता है ।।
रुत – रुत की है बात प्यारे , धूप के देखे पर जलते हैं।
कल आया तो कल देखेंगे , सांझ हुई चल घर चलते हैं।।

6
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ।
कांटों की सेज पे अपना बिस्तर यार बिछाना पड़ता है ।।

निशिदिन टकराना पड़ता है तूफानी झंझावातों से ।
पल -पल लड़ना पड़ता है अंधियारी काली रातों से।।
विपरीत हवाओं के रुख में भी दीप जलाना पड़ता है।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है।।

कदम – कदम पे पड़े जूझना जाहिल और मक्कारों से ।
कदम – कदम पे पड़े खेलना जलते हुए अंगारों से ।।
संघर्षों की धरती पे अपना नाम लिखाना पड़ता है।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ।।

खुद ही पोंछने पड़ते हैं लुढ़के आंसू गालों के ।
खुद ही सहलाने पड़ते हैं रिसते घाव ये छालों के।।
विचलित होते मन को अपने खुद समझाना पड़ता है ।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है।।

सबसे ऊंचा दुनिया में निज झंडा फहराने को।
स्पर्श क्षितिज का करने को गीत विजय के गाने को।।
ऊंचे पर्वत की छोटी तक अनथक जाना पड़ता है ।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है।।

बाधाओं की गहरी खाईयां मीलों भंवर के फेरे हैं।
कदम -कदम पे जिधर भी देखो तूफानों के घेरे हैं।।
बीच भंवर से कश्ती को खुद बाहर लाना पड़ता है।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है।।

सुख-चैन प्यारे त्याग-त्यागकर रात-रात भर जाग-जागकर।
अवरोधों के कांटे चुनकर समय से आगे भाग-भागकर ।।
स्वेद कणों से सपनों का मानचित्र बनाना पड़ता है।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ।।

जाल बिछाए बैठे हैं बधिक बहुत जमाने में।
कभी साथ नहीं आता है किसी को कोई छुड़ाने में ।
जाल तोड़कर स्वयं को यारो स्वयं उड़ाना पड़ता है।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है ।।

शह-मात का खेल खेलने कई बिसात बिछाए बैठे हैं।
लेकर तीर कमान हाथ में घात लगाये बैठे हैं ।।
शतरंजी चालों से दर्द स्वयं को स्वयं बचाना पड़ता है।
विजय मुफ्त में नहीं मिलती है मोल चुकाना पड़ता है।।

7
मेरी कविताएं….
मैं उनके लिए नहीं लिखता
जो कार में बैठकर
स्टीरियो ऑन करके रोमांटिक गीत सुनते हुए
देश की गरीबी पर चर्चा करते हैं।

मैं तो उनके लिए लिखता हूं
जो थक जाते हैं बेलचा लगाकर या
गेंती से खुदाई देकर और
पसीने की गंध से बुनते हैं परिवार के लिए
हजारों अधूरे सपने।

मैं सुनाना चाहता हूं उन्हें
अपनी लिखी कविता
जो उन्हें दोबारा खुदाई करने के लिए
और अधूरे
सपनों को पूरा करने के लिए
पुनः तैयार कर दे।

मेरी कविताएं तो उनकी संपत्ति हैं
जो चिथड़ों में तन ढके
भूखे पेट दिन-रात जूझते रहते हैं
खेतों में
लोगों का पेट भरने के लिए ।

मैं नहीं चाहता
मेरी किताबें किसी महंगे खूबसूरत
ड्राइंग रूम की शोभा बनें ।

मैं चाहता हूं मेरी किताबें
उस झोंपड़ के ताक में रहें जहां से
नन्हें हाथ उठाकर खुद
पढ़ सकें सदियों से चला आ रहा यह
शोषण का षड्यंत्र ।

ताकि बुन सकें वे भी
अपने पुरखों के सदियों से छोड़ें
अधूरे सपने…।। (16- 8- 2003)

8
कविता
————–
हमसे कभी अगर मगर नहीं होता।
कड़ी धूप में लंबा सफर नहीं होता।।

न जाने मैं कब का बिखर गया होता।
जो रब जैसा हमसफ़र नहीं होता।।

दुनिया में मैं भी पत्थर हो गया होता।
गर यह शायरी का हुनर नहीं होता।।

मैं दर्द की धूप से झुलस गया होता।
गर मां की दुआओं का असर नहीं होता।।

कुछ लोग थे मेरी उंगली पकड़ने वाले।
वरना इस शहर में बसर नहीं होता।।

उम्र भर रिसते रहते हैं ज़ख्म इनके।
कोई लफ़्ज़ों से बड़ा नश्तर नहीं होता।।

मैं भी हिंदू या मुसलमां हो गया होता।
गर रास्ते में शायरी का नगर नहीं होता।।

न हार का ग़म न जीत की खुशी होती ।
गर यह जिंदगी का समर नहीं होता।।

मानुष जन्म ही व्यर्थ हो जाता दर्द ।
जन्मा इस पहाड़ में अगर नहीं होता।।

9
मुलाकात….
शाम ढलने लगी है
सोचा सूरज से थोड़ी धूप मांग लूं
फिर सोचा
अब धूप का क्या करूंगा?

शाम ढलने लगी है रात तो आ ही जाएगी
फिर मुट्ठी भर धूप की पोटली
आखिर कब तक संभाल कर रखूंगा ।

इसलिए सूरज तुम
अपनी धूप अपने पास रखो
मेरे यहां अब शाम उतरने लगी है ।

अगली सुबह
फिर मुलाकात हुई तो तुमसे तब
मुट्ठी भर नहीं
अंजुरी भर मांग लूंगा और
मुझे विश्वास है तुम अवश्य दे दोगे।।

10
हाशिये का आदमी….
हाशिये पर खड़ा आदमी
धूप में झुलस जाता है मूक होकर
क्योंकि वह सूरज के खिलाफ विद्रोह
नहीं करना जानता ।

वह हवा के खिलाफ
बगावत नहीं करना चाहता
क्योंकि उसे हवा का न तो रुख भांपना
आता है और न ही
हवा के साथ साथ चलना ।

हाशिये का आदमी
इतना भोला है आज भी कि
बरसने और गरजने वाले बादलों
में फर्क नहीं कर पाता
और हर बार ठगा जाता है ।

इतना निहत्था है यह
कि इससे सभी हथियार
छीन लिए गए हैं ताकि
यह कभी सत्ता के खिलाफ
विद्रोह न कर सके ।

प्रलोभनों की प्रवंचना
और यथार्थ की
इबारत के बीच खिंची महीन रेखा
इसे न तो पढ़नी आती है
न बांचनी
इसलिए हरबार
इसके हिस्से भूख लिख दी जाती है ।

हर चक्रव्यूह इसके आसपास ही
रचा जाता है
और हरबार इसका ही वध हो जाता है।

बड़े बड़े बैनरों – नारों के बीच
इसका हिस्सा बांटने वाले
हरबार खा जाते हैं ।

वह न आंकड़ों का गणित
जानता है
और न ही भाषणों की प्रवंचना
हरबार वह पत्तों की तरह
नारों की बयार में बह जाता है ।।
अशोक दर्द
डलहौजी चंबा हिमाचल प्रदेश

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