आरोप प्रचंड
“आरोप प्रचंड”
हाथ से लेकर सदा, रुपया चंद;
पक्ष में गाती तब , राठौर उदंड;
कोर्ट ने माना जो,आरोप प्रचंड;
तब बुद्धि पड़ गई, उसकी मंद।
बड़ी चिंता थी, यूपी-बिहार की;
अब चिंता होगी,कई F.I.R की;
हिसाब देगी वो, हर उदगार की;
याद आयेगी, देशद्रोही यार की।
सालों भटकी,विपक्षी ठिकाना;
अब भटकेगी, वो थाना -थाना;
मुफ्त खायेगी, जेल का खाना;
वहीं गायेगी,काबा-काबा गाना।
अब भारत में न भ्रम फैलाएगी;
निज गलती पर,वह पछताएगी;
देश व सेना को सही ठहराएगी;
सदा, राष्ट्रपुष्प कमल बताएगी।
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