ग़ज़ल 122 122 122 122
ग़ज़ल 122 122 122 122
अगर आज फिर हिज्र की रात होगी,
तो कल वस्ल की यारों सौग़ात होगी।
मुहब्बत चराग़ों से करने लगा हूं,
यहाँ ना हवाओं की अब बात होगी।
अगर चांद को आसमां से उतारूँ,
तो कल चांदनी भी मेरे साथ होगी।
कभी इश्क़ मंझधार से करके देखो,
तो साहिल की ना जंगे-औक़ात होगी।
अभी रेस हम जीतते जा रहे हैं,
मगर अपनी भी तो कभी मात होगी।
अगर आज दिल ग़म से लबरेज़ यारों ,
तो कल खुशियों की क्यूं न बरसात होगी।
ये दुनिया है छोटी बहुत छोटी दानी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।
( डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )