#अस्मत
#अस्मत
लुटती अस्मत ज़ख्मी धरती, निज लहू पर शर्मिंदा है।
कौन भरोसे लायक है, जब अपना ही बना दरिंदा है।
भारत की संस्कृति में, जहाँ नारी को पूजा जाता है।
उसकी हर डाली पर बैठा, एक निर्लज्ज परिंदा है।
@डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’