शायद
शायद मुझमें वो हुनर नहीं की,
एक अच्छा इंसान बन पाऊं,
शुरू करते ही बीत जाता पूरा दिन,
और जाने कब हो जाती है शाम,
अपनों को आज कितनी दी खुशी,
शाम को बैठ मै गिनता जैसे मुंशी ।
शायद मेरा अब वो समय नहीं की,
मै किसी को भरपूर समय दे पाऊं,
दिन भर काम करता जैसे बैल,
थोड़ी सी भी कमी रह जाय,
तो ऐसे रेला जाता जैसे शैल।
शायद अब मेरी वो उम्र नहीं,
की फिर फुर्तीला लड़का बन पाऊं,
अब अपने को समझाना है,
जीवन हर पल नापने का पैमाना है,
जहां तौला जाता है आपका तन और मन,
चाहे आपका कितना भी अच्छा हो आचरण।
शायद अब जीवन ऐसे ही बीतेगा,
फिर से अब अच्छा दिन नहीं लौटेगा,
अब शांत सा बहुत हो गया हूँ,
कुछ नहीं सोचता बस खो सा गया हूँ,
नहीं चाह अब बहुत अधिक ना ही जरूरत है,
जैसी भी है ए जिंदगी कहना ही है कि तू खूबसूरत है।
विकास शुक्ल