संग साँसों के ....
संग साँसों के ….
ज़िंदगी
हर कदम रंग बदलती है
कभी लहरों सी मचलती है
कभी साहिलों की रेत पे चलती है
कभी उसके दामन में
कहकहों का शोर होता है
कभी निगाहों से बरसती है
साथ मौसम के
हर शै बदल जाती है
कभी सबा सुलाती है
तो कभी बहुत सताती है
बड़ी अजीब है ज़िंदगी की हकीकत
जितना समझते हैं
उतनी उलझती जाती है
अन्ततः थक कर
अंतहीन तिमिर में खो जाती है
ज़हन में यादों का क़ाफ़िला छोड़ कर
संग साँसों के ज़िंदगी
मुट्ठी से रेत की तरह फिसल
बेआवाज़ निकल जाती है, बेआवाज़ निकल जाती है ……
सुशील सरना