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21 Sep 2025 · 4 min read

सौतेले मां

लघुकथा… ‘सौतेली माँ’

आज रन्नों की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसका उदास चेहरा खिल उठा। मेहमानों के जाते ही वह शीघ्रता से अपने कमरे में आई और आलमारी से एक छोटा सीसा निकालकर अपना मुँह निहारने लगी। बहुत दिनों के बाद वह इतना खुश दिखाई दे रही थी। उसको खुश देख मालती जो उसकी सौतेली माँ थी, ने पास आकर कहा, ‘देख रन्नों! इस बार कोई गड़बड़ मत कर देना, बड़ी मुश्किल से यह रिश्ता पक्का हुआ है। तू वहाँ राज करेगी।’ एक गहरी साँस लेते हुए, ‘हे! भगवान, एक बार इसके हाथ पीले हो जाए, तो मैं गंगा नहा आऊँ।’ रन्नों ने माँ की बात पर बहुत ध्यान नहीं दिया। उसके कानों में तो बस, सुन्दर के वह शब्द गूँज रहे थे कि ‘मुझे लड़की पसंद है’। मालती, रन्नों को समझाती रहीं और रन्नों सपनों की दुनियां में खोई रही। वह बार-बार अपना मुँह सीसे में देखे जा रही थी। आज उसे अपना चेहरा एकाएक सुन्दर लगने लगा था। उसकी आँखों में न जाने कितने सपने तैरने लगे और वह मन ही मन प्रसन्नता से झूमने लगी। किन्तु मालती के मुख पर चिंता की लकीरें साफ-साफ दिखाई दे रही थी, उसके मन में उठते प्रश्न उसे आशंकित कर रहे थे कि कहीं रन्नों को सच्चाई की जानकारी न हो जाए और वह शादी करने से मना कर दे। यद्यपि इस बार लड़के एवं उसके घर वालों ने रन्नों को पसन्द कर लिया था और दहेज की कोई मांग भी नहीं थी, फिर भी जब-तक शादी न हो जाए, तब-तक कुछ भी कहा नहीं जा सकता। वह रन्नों की बढ़ती उम्र एवं शादी न हो पाने के कारण अक्सर परेशान रहती थी। रन्नों को देखने इसके पहले भी कुछ लड़के एवं उनके घर वाले आये थे लेकिन एक को छोड़कर सभी ने रन्नों का रंग साँवला होने के कारण नापसन्द कर दिया था। एक से रिश्ते की कुछ बात तो बढ़ी, लेकिन अधिक दहेज की मांग से रन्नों दुखी थी क्योंकि उसके माता-पिता की क्षमता उतनी दहेज देने की नहीं थी, इसलिए रन्नों ने खुद ही ऐसी शादी करने से इंकार कर दिया था। मालती रन्नों की सौतेली माँ जरूर थी लेकिन बच्चों के लालन-पालन में कोई अन्तर नहीं किया। उसने पूरी कोशिश किया कि रन्नों की शादी ठीक-ठाक घर में हो जाय किन्तु उसकी लम्बाई एवं साँवले रंग के कारण रिश्ता नहीं बन पा रहा था। इधर रन्नों काफी खुश रहने लगी। वह अपनी माँ के साथ घर के कामों में हाथ बँटाती और अपने छोटे भाई-बहनों का पूरा ध्यान रखती। ऐसा लग रहा था कि वह ससुराल में जाकर अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने का अभ्यास कर रही हो। मालती जब भी रन्नों को सीसे के सामने मुस्कराते हुए देखती, तो कई प्रश्न उसके मन में उत्पन्न हो उसे बेचैन करने लग जाते। कई बार रन्नों ने माँ से परेशानी का कारण पूछा लेकिन हर बार उसने कोई बहाना बनाकर बात टाल दिया। जैसे-जैसे शादी का दिन नजदीक आ रहा था, वैसे-वैसे मालती के अन्तर्मन में द्वंद्व भी बढ़ता ही जा रहा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?। वह कभी-कभी सोचती थी कि रन्नों को सब सच्चाई बता दे क्योंकि उसे पता था कि शादी के बाद सच्चाई सबके सामने आ ही जायेगी, किन्तु कहीं रन्नों शादी से इंकार न कर दे, फिर कौन उससे शादी करेगा? रन्नों के पापा तो समझ जायेंगे.. परन्तु क्या रन्नों हमें समझ पायेगी?, क्या समाज सौतेली माँ होने का ताना नहीं मारेगा?। इसी उधेड़बुन में मालती के व्यवहार में चिड़चिड़ापन आने लगा था। वह चिंतित रहने लगी थी। रन्नों, माँ के व्यवहार में आ रहे परिवर्तन को महसूस कर रही थी। धीरे-धीरे उसे यह लगने लगा कि कुछ तो है जिसे माँ सबसे छिपा रही है। उसने यह तय किया कि वह माँ की चिंता का कारण जानकर ही रहेगी। एक दिन जब मालती, रन्नों को उसकी शादी के कपड़े दिखा रही थी, तो उसने पूछा, ‘माँ, तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो, आपकी परेशानी का कुछ तो कारण है..’ रन्नों कुछ और बोलती, इसके पहले ही मालती ने मुस्काते हुए कहा, ‘अपनी बेटी की शादी कर रही हूँ, चिंता तो होगी ही… ‘। रन्नों माँ के जवाब से सन्तुष्ट नहीं हुई। उसने कहा, ‘ यह दिखावे की हँसी है माँ, मैं जानती हूँ कुछ तो है जो आप चाहकर भी नहीं बता पा रही हैं। मुझे सच-सच बताइए बात क्या है?’। मालती बार-बार बात को टालती रही किन्तु रन्नों की जिद ने उसे सच बताने के लिए विवश कर दिया। मालती की आँखों से आँसू गिरने लगे। उसने रन्नों के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘जिस लड़के के साथ तुम्हारी शादी हो रही है, उसका एक विवाह पहले हो चुका है किन्तु शादी के तीन साल बाद ही उसकी पत्नी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई और..’। ‘उसका एक बच्चा भी है.. रन्नों ने दबी आवाज में कहा। उसकी आँखें आंसुओं से भर गईं। उसका हँसता चेहरा कुम्हला गया। वह सुन्न सी एकटक माँ को निहारने लगी, जैसे वह अपनी माँ की विवशता को पढ़ रही हो और कह रही हो कि ‘माँ, आपने मुझे अपने जैसा बना दिया।’ मालती ने रन्नों को गले से लगाकर कहा, ‘बेटी, मैंने जो किया तुम्हारे हित के लिए ही किया है, अब घर की इज्जत तुम्हारे हाथों में है।’ रन्नों लड़खड़ाते हुए खड़ी हुई और अपने कमरे की तरफ जाने लगी। जाते-जाते उसने मालती से कहा, ‘माँ, आप निश्चिंत रहें। मैं आप की तरह ही अपना कर्तव्य निभाऊँगी।’ यह सुन मालती अपना मुँह आंचल में छिपा सुबक-सुबक रोने लगी।

डाॅ. राजेन्द्र सिंह ‘राही’
(बस्ती उ. प्र.)

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