नक़ाब
नक़ाब में छुपा हुआ चेहरा सुकून में है कितना,
दीदार करने के लिए बेनकाब ही तरसते है।
नक़ाब पहन के क्या छुपाते है ये हुस्न वाले ,
ये कौन सा चेहरा है जो नहीं दिखाते ये लोग।।
नक़ाब उठ गया तो राज उनका सामने आएगा,
गर जुबान खुल गया तो अरमान पता चल जाएगा।।
नक़ाब पहनने वाले गुप्त करते है कुछ काम “बिपिन”,
लगा कर नकाब छुपा के रखते है पहचान अपनी हरदम।
रचनाकार
बुद्ध प्रकाश
मौदहा हमीरपुर।