देख दीवाना हो गया मैं तो
देख दीवाना हो गया मैं तो
तेरे टैरिस पे सो गया मैं तो
मंज़िलें मेरी मुंतज़िर ठहरी
रहगुज़र में ही खो गया मैं तो
कहते कहते दास्तां ग़म की
कितनी जिल्दें भिगो गया मैं तो
मुझको सब बोझ ही समझते रहे
जब के पर्वत को ढो गया मैं तो
गुल की माला मुझे पिरोनी थी
ख़ार को ही पिरो गया मैं तो
मुझको नापा गया पहाड़ों से
हाय बौना ही हो गया मैं तो