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21 Sep 2025 · 3 min read

अध्यक्ष और अध्यक्षता

व्यंग्य
अध्यक्ष और अध्यक्षता

अध्यक्ष ढूंढना आसान नहीं होता। इसमें सालों लग जाते हैं । पहले लोग आसानी से मिल जाते थे। बन भी जाते थे। अब कोई मिलता नहीं। मिल जाए तो बनता नहीं। राजनीति से इतर साहित्य अपवाद है। यहां विकल्प खुले हैं। सब बनने को तैयार हैं। ये समय से आते हैं। सबको जी भरकर सुनते हैं। कुछ स्वास्थ्य कारणों से नहीं भी सुनते। जब तक इनका नंबर आता है। लोग चले जाते हैं। या खाने और जाने की जल्दी में होते हैं।
ये सहृदय हैं। बुरा नहीं मानते। अपने पैसे और संसाधन से आते हैं। चले जाते हैं। कोई सहायक साथ में होता है। आहिस्ता आहिस्ता। ये किसी सहारे के मंच तक पहुंचते हैं। अध्यक्षता करते हैं। कुछ भी पढ़ लो। कुछ भी कर लो। ये टोकते नहीं। रोकते नहीं। आधी बातें आत्म बल से आत्मसात करते हैं। आधी छोड़ देते हैं। बस, आंखों से विश्लेषण करते हैं। एक माला। एक शॉल और दद्दा संबोधन से खुश हो जाते हैं।

अध्यक्षता को लेकर कभी विवाद नहीं हुआ। किसी ने नहीं कहा, मैं बनूंगा। उनको मत बनाओ। पहले अध्यक्षों की संख्या अधिक थी। आयोजक को तय करना पड़ता था। किसे बनाएं? अब ऐसा नहीं है। आशीर्वाद की बेल धीरे धीरे कट रही है। बड़े कवि सम्मेलन तो अब बिना अध्यक्ष के भी हो जाते हैं।

वैसे भी किसी संस्था में अध्यक्ष का कोई खास रोल नहीं होता। चुटकी भर हल्दी जितना होता है। जैसे बिना हल्दी सब्जी नहीं बनती। शादी नहीं होती। वैसे ही कार्यक्रम बिना अध्यक्ष के नहीं हो सकते। कोई तो वरिष्ठ होना चाहिए। जो पूरे समय बैठा रहे। सुनता रहे। आशीर्वाद देता रहे। सोचता रहे…”कभी हम भी जवान थे।”
अनुभव की टकसाल में सिक्के कब ढल जाएं, पता नहीं चलता। दिन यूं ही ढल जाता है।

किसी नौजवान को अध्यक्ष बनाने का रिस्क कोई नहीं लेता। सही भी है। वो कभी भी महामंत्री के रोल में उतर सकता है। दिल भी मजबूत। घुटने भी मजबूत। फिर काहे का डर। युवा वो जिसमें युवान हो। बुजुर्ग वो जिसके सीने में तूफान हो।
अलबत्ता
राजनीति में ऐसा नहीं है। उसका कार्यकाल तय होता है। रिपीट होता रहता है। यहां अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति को भी चांस मिलता है। कई पार्टियों में ऐसा होता है। कार्यकर्ता पूछते हैं..”.ये कौन हैं? ” अरे, तुझे नहीं पता। अपने अध्यक्ष हैं। अध्यक्ष को पता भी नहीं चलता। उनकी टीम घटित हो जाती है। पाकिस्तान इजराइल से हाथ मिलाता रह जाता है। अमेरिका सैनिक उतार देता है। ये अध्यक्ष सिर्फ पीसी( प्रेस कांफ्रेंस) करते हैं। कमांडर इनको कभी भी डांट देता है। कुर्सी से उतार देता है।

जितनी बड़ी पार्टी होगी। अध्यक्ष की कुर्सी उतनी टेढ़ी होगी। दावेदार कम होते हैं। कई हाथ जोड़ लेते हैं… “ना बाबा ना। हमको मत बनाइए। हम तो अभी सक्रिय हैं। विट्ठल लाल को बना दीजिए। ” वो भी तैयार नहीं। कौन किनारे लगना चाहता है? बन गए। हवा बदल गई। तो कौन जिम्मेदार होगा? सब कहेंगे, अध्यक्ष जी की वजह से हार गए। कुल मिलाकर, अध्यक्ष की कुर्सी कांटों का ताज है। यह गाजर का हलुआ है। गाजर को घिसो। पकाओ। मावा डालो। फिर खाओ। इतना झंझट कौन मोल ले!
आज
जहां भी देखो अध्यक्ष ही अध्यक्ष हैं। बाजार से लेकर दफ्तर तक अध्यक्षों की बाढ़ है। आप कौन? जी मैं फलां का अध्यक्ष। आप कौन? जी मैं आर डब्ल्यू ए का अध्यक्ष। अध्यक्ष इतने। जितने सिर के बाल।

सब अध्यक्षों को मिलकर एक कंपनी बना लेनी चाहिए। जिसको अध्यक्ष चाहिए। ले ले। झंझट खत्म। आउट सोर्सिंग से अध्यक्ष आयेंगे। कोई उंगली भी नहीं उठाएगा। जिनको अध्यक्षता करानी है..पेमेंट करे..ले जाए। अब पेशेवर गेस्ट और अध्यक्ष यही करते हैं। एक साहब ने कहा भी..”भाई। हम आ जाएंगे। आपकी अध्यक्षता कर लेंगे। जितनी देर कहोगे। बैठ जाएंगे। लेकिन मुफ्त में नहीं आयेंगे। क्यों छम्मन लाल जी। “जितने चाहो विमोचन कराओ। उद्घाटन कराओ। हम दोनों चीजों में माहिर हैं।
सियासत से साहित्य हमेशा उपर रहा है। साहित्य में अध्यक्ष ही अध्यक्ष। राजनीति में तलाश जारी है। अब तुम ही बोलो..”हमारे दद्दा हैं न ग्रेट। गेट वे ऑफ इंडिया।”

सूर्यकांत
21.09.2025

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