दुनिया गोल है ( कहानी --अंतिम किश्त )
दुनिया गोल है ( कहानी –अंतिम किश्त )
अब तक– ऐसे ही एक रविवार जब घर में सुबह चाय पीते बैठा था कि दो शख्स घर आये। दोनों पिता और पुत्र थे।पिता का नाम आदित्य गुप्ता और पुत्र का नाम प्रवीण गुप्ता।
आगे–आते ही आदित्य जी ने अपना परिचय दिया और कहने लगे कि मेरा बेटा प्रवीण मुझे बहुत परेशान कर रहा है। मेरी एक किराने की बड़ी दुकान है। जिससे अब मैं फुरसत पाना चाहता हूँ और बेटे को दुकान संभालने कहता हूँ तो वह मान नहीं रहा है। कहता है मुझे तो स्टील फेक्ट्री खोलनी है। आप मुझे 4 करोड़ों दीजिये। मेरी समूची पूंजी ही 4 करोड़ की है। मैं यह रिस्क नहीं ले सकता । जब दोनों अपनी अपनी बात पर जोर देने लगे तब मैंने उन्हें सलाह दिया कि बेटे को स्टील फेक्ट्री की राह पर आगे बढ़ने से रोको मत। जहां तक उसे पैसों का सपोर्ट देने की बात है आप उसकी मांग का आधा पैसा दे सकते हैं। बाक़ी पैसे वह बैंक से या बाज़ार से लोन ले सकता है। मेरी बात बाप बेटे दोनों का सही लगी और वे मुझे बहुत बहुत धन्यवाद देते हुए घर चले गये। इसके बाद तो धीरे धीरे आदित्य और प्रवीण से मेरे व्यक्तिगत संबंध बन गये। अब हम एक दूजे के घर भी बिना औपचारिकता के भी आने जाने लगे। ऐसी ही एक घरेलू बातचीत में मुझे पता चला कि प्रवीण तो आदित्य जी का गोद लिया बेटा है। उसे आदित्य जी ने किस हाल में गोद लिया मुझे नहीं पता चल पाया। समय गुजरता गया। कुछ महीनों बाद एक दिन आदित्य जी का फोन आया कि मेरा बेटा यहां से दूर छत्तीसगढ़ गया है। वह अपनी फेक्ट्री भिलाई स्टील प्लांट के पास ही खोलना चाहता है। इस हेतु उसे एक ग्राम नगपुरा में 15 एकड़ जमीन पसंद आ गई है । वह उस जमीन को खरीदने को तैयार है लेकिन एक रोड़ा आ रहा है। ब्रोकर कह रहा हे कि उक्त जमीन के मालिक का निधन हो गया है और उनकी पत्नी भी स्वर्ग सिधार गई हैं । उनके दो बच्चे हैं पर वे दोनों गांव को छोड़ कहीं चले गये हैं । जिसके बारे में किसी को भी पता नहीं है । अतः अभी रजिस्ट्री नहीं हो सकती। आप ओके करोगे तो मैं ऐसे कुछ काग़ज़ात आपके हक में बनवा सकता हूँ कि आप उस ज़मीन पर काबिज हो सकते हैं। ऐसे में हमें आपकी सलाह चाहिए कि हम क्या करें।
आदित्य जी की यह बात सुन मैं उद्वेलित हो गया। उनकी बातों में ग्राम नगपुरा का जिक्र आया तो मुझे लगा इस गांव से व इस नाम से मेरा कोई तो संबंध है। वैसे भी मुझे गाहे बगाहे एक स्थान का सपना बीच बीच मे दिखता था। उस गांव का नाम मैं पढ़ता था नागपुर। मुझे 3 दफ़ा नागपुर जाकर यह एहसास हो गया था कि नागपुर से मेरे बीते दिनों का कोई भी रिशता नहीं है। जब आदित्य जी ने नगपुरा ग्राम का उल्लेख किया तो लगा हो सकता है जो सपना मुझे नागपुर के नाम से दिखाई देता है । वह शायद नगपुरा का होगा। मैने आदित्य जी को कहा अभी ज़मीन बाबत कोई ट्रांजैक्शन नहीं करना है।
10 दिनों बाद मैं सुबह 10 दुर्ग शहर की धरती पर था। दुर्ग शह्र भी मुझे कुछ जाना पहचाना लगा। वहां से टेक्सी लेकर मैं नगपुरा की ओर रवाना हो गया। नगपुरा पहुंचने में 15 मिनट्स ही लगे। सारा रस्ता कुछ पहचाना लग रहा था। नगपुरा पहुंचते ही गांव के मुखिया शंभू जी मिल गये। वे मुझे पहले गांव का शिव मंदिर दिखाने ले गये । जहां मैं शंकर भगवान का आशीर्वाद लेकर बाहर निकला तो मंदिर के ठीक बगल में बड़ा सा मकान नज़र आया। जिसके दरवाज़े पर ताला लगा था। दीवारों का रंग रोगन उखड़ चुका था। ऐसा लग रहा था वह बहुत दिनों से घर बंद है। मुझे वह घर भी जाना पहचाना लगा। इतने में सामने से प्रवीण आते दिखा। मुझे देख वह बहुत खुश हुआ। फिर मैंने उसे अपने आने का मकसद बताया कि मैं उस जमीन को देखने बाबत आया हूँ । जो तुम्हें पसंद आई है। साथ एक और मकसद यह भी है कि मैं बरसों सपने में एक गांव का दृश्य देखता हूँ । जिसके नाम के आगे नागपुर दिखता है। जिसमें एक घर दिखाई देता है। जिसके बाहर दो बच्चे खेलते दिखाई देता है। उस घर का स्वरूप वैसा ही है जैसा कि यह घर जिसके बाहर हम खड़े हैं। मुझे एहसास हो रहा है वह गांव नागपुर नहीं नगपुरा है। ऐसा लगता है कि मेरा तार कहीं न कहीं ग्राम नगपुरा से कुछ न कुछ तो जुड़ा है। इसके बाद मैं, प्रवीण और गांव के मुखिया शंभू जी उस घर का ताला खुलवा कर अंदर गये। अंदर तीन कमरे ,एक बड़ा सा आंगन ,एक परछी नज़र आये । सभी स्थान जालों से आच्छादित थे। वहीं एक कमरे में एक फोटो फ्रेम टंगा था। जिसमें 2 छोटे बच्चों के फोटो थे। उस फोटो को देख मैं और प्रवीण दोनों उछल पड़े। उसमें से एक फोटो मेरी थी । बंबई में भी इसी उम्र की मेरी फोटो रवि गुप्ता जी के साथ ड्राईंग रूम में टंगी थी। वही प्रवीण ने भी बताया लगभग इसी उम्र की मिलती जुलती एक फोटो मेरे घर में आदित्य जी के साथ है। इसका मतलब ये हुआ कि हमारे तार इसी घर से हैं। यानी हम दोनों इस घर के ही औलाद हैं। यानी मैं बड़ा भाई संजय हूँ और प्रवीण छोटा भाई नवीन है। फिर क्या हम दोनो गले लग के रोने लगे। ये हमारे खुशी के आंसू थे। नगपुरा के मुखिया भी बड़े खुश दिखे और हम दोनों को बधाई देने लगे। कुछ देर बाद तो वहां गांव वालों का तांता लग गया। हर कोई हमें आशीर्वाद दे रहे थे साथ ही वे सब आशचर्य चकित थे ,इतने बरसों बाद हमें गांव में देख। वे हमसे पूछने लगे कि आखिर आप लोग इतने दिनों तक कहाँ थे। हम उनका जवाब अपने मन मुताबिक देते रहे। फिर हमने बंबई स्थित अपने अपने घर एसटीडी कर अपने पालक पिता गण को नगपुरा में जो बातें सामने आई उसे बताईं और उन्हें जल्द नगपुरा आने के निवेदन किया। हम दोनों ने अपने रिश्तों को प्रमाणित करने एक दूजे की पीठ देखी तो मेरी पीठ पर * स* लिखा पाया और नवीन की पीठ पे * न* लिखा पाया। अब हम दोनों अपने पैत्रिक घर में उचित व्यवस्था करके वहीं ठहर गये। ताकि नगपुरा स्थित पारिवारिक प्रापर्टिस संबंधित सारी सरकारी व कानूनी काग़ज़ात अच्छे से तैयार कर कानूनी रुप से अधिकार में लिया जा सके।।
कुछ दिनों में हमने कलेक्टर आफिस के विभिन्न विभागों से प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिये कि हम दोनों उपेन्द्रनाथ जी के औलाद संजय और नवीन हैं। अब तो वह 15 एकड़ जमीन जिसे नवीन ने पसंद किया था और खरीदना चाहता था वह ज़मीन स्वाभाविक रुप से हमारी ही पैत्रिक जमीन थी। बस क्या था मेरी आदित्य और रवि जी की सहमति से नवीन की फैक्ट्री का निर्माण प्रारंभ कर दिया गया।
आज 2 वर्षों बाद नवीन की स्टील फेक्ट्री का उदघाटन होने जा रहा है। फेक्ट्री का उदघाटन करने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री आ रहे हैं। बहुत सारे मीडिया कर्मी इस कार्यक्रम को कवर करने आये हैं। वे मेरा और नवीन का साक्षात्कार लेने भी आतुर हैं। मंच में संजय, नवीन, रवि जी,आदित्य जी व शंभू जी बैठे हैं । वे सब मुख्य मंत्री जी का इंतज़ार कर रहे हैं। यहाँ बैठे हर शख्स के मन में जिज्ञासा है कि आखिर मुख्य मंत्री जी संजय और नवीन के बारे में क्या कहेंगे और रवि जी तथा आदित्य जी का संजय-नवीन से क्या संबंध है।
( समाप्त– कथाकार डाक्टर संजय दानी दुर्ग — सर्वाधिकार सुरक्षित। )