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20 Sep 2025 · 3 min read

ब्रम्हर्षि विश्वामित्र

दोहा

परम गुणी गुणवान हो, सर्व सिद्धि की खान।
ऋषियों में ऋषिराज हो, महिमा अमित महान।।

जोड़ हाथ हम वंदना, करते नित महराज।
अपने सेवक “राम” के,कर दो पूरण काज।।

चौपाई

विश्वामित्र परमब्रह्म ज्ञानी,जिनकी गाथा सुखद सुहानी।।
वेद उपनिषद के ऋषि ज्ञाता, कृपा सिन्धु विवेक के दाता।।१।।
गाधि तनय अतुलित बल राशी,सत्य सनातन ऋषि अविनाशी।।
महा तपस्वी वेद प्रवीना,दिव्य ज्ञान शंकर से लीना।।२।।
वशिष्ठ आश्रम आप सिधाए,सैन सहित ऋषि भोज कराए।।
गाय नंदिनी देखी महिमा,छल उत्पन्न हुआ तब मन मा।।३।।
दिखा सैन बल गौ तब छीनी,ऋषि की सब माया हर लीनी।।
देख कपट नंदिनी रिसाई।सेना यमपुर सब पहुँचाई।।४।।
विश्वामित्र सुत ऋषि पर धाए।एक छोड़ यमलोक पठाए।।
देख दृश्य राजन घबड़ाए। लौट वहाँ से निज घर आए।।५।।
सौंप सिंहासन सुत को दीना।वन जाकर कठोर तप कीना।।
राजन तप शिव जी हर्षाए। मनवांछित फल शिव से पाए।।६।।
बदला लेने की मन ठानी। वशिष्ठ जी पर धनुही तानी।।
छोड़ अस्त्र बहु ऋषि पर दीना। क्षीण अस्त्र सब ऋषि ने कीना।।७।।
करी प्रकट ऋषि भीषण ज्वाला।देव असुर नृप हुए विहाला।।
नृप ने की ऋषि से प्रार्थना।शमन करो प्रभु क्रोध व्यंजना।।८।।
ऋषि ने उर का क्रोध मिटाया।सारा भूमण्डल हर्षाया।।
व्यथित हृदय राजन घर आए।ले पत्नी कानन को धाए।।९।।
छोड़ अन्न जल फल बस खाएं। करें तपस्या ईश मनाएं।।
तप से ब्रम्हदेव हर्षाए।नृप राजर्षि पद पर बैठाए।।१०।।
मिटी किन्तु न भूप की शंका।चले बजाने नृप तप डंका।।
इसी समय त्रिशंकु इक राजा।ख्यातिलब्ध थे सकल समाजा।।११।।
सशरीर स्वर्ग जाना चाहें।खोज रहे थे सुरपुर राहें।।
ऋषि वशिष्ठ निज चाह बताई। वशिष्ठ चाह दिए ठुकराई।।१२।।
निकट तनय वशिष्ठ सुत आए। अपने मन की व्यथा सुनाए।।
सुन नृप वाणी तनय रिसाए।भूप श्राप मातंग बनाए।।१३।।
स्वर्ग चाह पर भूप न त्यागी। स्वर्ग लगन मन में बस लागी।।
विश्वामित्र के आश्रम आए।विनय पूर्वक वचन सुनाए।।१४।।
सुन नृप वचन साधु मुसकाए।हवन निमंत्रण ऋषि भिजवाए।।
वशिष्ठ सुत आग्रह ठुकराए।तप बल से यमपुर पहुँचाए।।१५।।
भय खा ऋषि सब यज्ञ को आए।विधी पूर्वक हवन कराए।।
पर देव न जब कोई आया।तब बल से नृप स्वर्ग पठाया।।१६।।
जब नृप देखा सुरपुर आते।भूप इंद्र भेजा धमकाते।
यहाँ जगह न तुम्हें है पापी।रहें यहाँ बस परम प्रतापी।।१७।।
वापस भू नृप आते देखा। खींची भूमण्डल पर रेखा।।
गिरते नृप के प्राण बचाए।तप बल से ऋषि स्वर्ग बनाए।।१८।।
तारामंडल तुरत बनाया।नृप की खातिर स्वर्ग बसाया।।
देख दृश्य सुर आए द्वारे। कहें हरो ऋषि कष्ट हमारे।।१९।।
बोले तब ऋषि मृदु बानी, स्वर्ग हेतु नृप हठ है ठानी।।
नभ धरती केन्द्र का स्वामी।नृप त्रिशंकु मेरा अनुगामी।।२०।।
सुन ऋषि वचन देव घर आए। विश्वामित्र सुर शोक मिटाए।।
द्विज पद खातिर धुनी रमाई। प्रभु से करने लगे ढिठाई।।२१।।
नहीं अन्न का दाना खाएं। सच्चे मन बस प्रभु को ध्याएं।।
जब की पूरी तपो साधना। बैठे भोजन हेतु आँगना।।२२।।
आए करने इंद्र याचना।पूरी की ऋषि भोज कामना।।
अपना भोजन सब दे डाला।स्वयं न खाया एक निवाला।।२३।।
अपूर्ण साधना निज जानी। बैठे तप जा फिर ऋषि ज्ञानी।।
फैला तप से सृष्टि उजाला, बड़ी तीव्र थी तप बल ज्वाला।।२४।।
सृष्टि रचयिता तुरत पधारे।हो प्रसन्न यह वचन उचारे।।
उठो वत्स अब तप से जागो।मन चाहा वर हमसे माँगो।।२५।।
सुन वाणी नैना ऋषि खोले।हाथ जोड़ कर प्रभु से बोले।।
द्विज पद दे दो हमको दाता। वेदों का बन जाऊँ ज्ञाता।।२६।।
द्विज कह वशिष्ठ गले लगाएं।हम भी प्रभु ब्रम्हर्षि कहाएं।।
हुईं समग्र तब मनोकामना।मिटी हृदय की कुटिल भावना।।२७।।
ऋषि वशिष्ठ ने जब यह जाना। विश्वामित्र को द्विज तब माना।।
ज्ञानी ऋषि सा और न दूजा। जोड़ हाथ सब करते पूजा।।२८।।
ब्रम्ह वेद हैं ऋषि की वाणी,गाता महिमा हर इक प्राणी।।
ज्ञानी ध्यानी ऋषि बैरागी। त्याग तपस्या प्रभु अनुरागी।।२९।।
गाता महिमा जगत तुम्हारी,हर लो ऋषिवर पीर हमारी।।
कपट पाप भय की क्षयकारी।कथा आपकी मंगलकारी।।३०।।

दोहा

ध्यान लगा कर जो सुने,गाथा परम पुनीत।
वो नर होते हैं नहीं,जीवन में भयभीत।।

||ॐ शिव हरि||

स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

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