तुम ही बताओ न ...
तुम ही बताओ न …
क्या हुआ
हासिल
फासलों से
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न//
इक लम्हा
इक उम्र को
जीता है
ख़ामोशियों के
सैलाब पीता है
उल्फ़त के दामन पे
हिज़्र की स्याही से
ये कैसी तन्हाई
लिख डाली
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न//
ये किन
आरज़ूओं के अब्र
रफ्ता रफ़्ता
पिघल रहे हैं
एक लावे की तरह
चश्मे साहिल से
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न//
क्यूँ हर शब्
तेरी मख़मूर नज़रें
मेरे तन्हा लम्हों में
मुख़ातिब होती हैं
मुझसे
क्यूँ तेरे बदन की
आबनूसी महक
मुझे
बैचैन किये रहती है
क्यूँ मेरे ख्यालों के
जिस्म पर
तुम्हारे अबोले लम्स
आज भी
रक़्स करते हैं
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न//
मेरे अश्कों की लकीरों में
तैरते सवालों को
अंजाम दे जाओ
तिश्नागर लबों को
अपने लबों से
ग़ुम हुई पहचान
दे जाओ
ले गयी थी
जो मुझसे छीन के
सूखे ही सही
वही गुल
वही अरमान
दे जाओ
भला
कब तलक ठहरूं
गैरों के शानों पर
फ़ना होने से पहले
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न//
कब तलक
मेरे चेहरे से
उड़ता कफ़न
तुम्हारे इंतज़ार में
उड़ता ही रहेगा
अब
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न//
सुशील सरना