घनाक्षरी छन्द-मेरी बारी-कविता:अरविंद भारद्वाज
घनाक्षरी छन्द-मेरी बारी-कविता
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जाने-माने कवियों की, एक महफिल सजी
मुझे भी बुलाया और, मैं भी था कतार में
घूर रहे मंच पर , देख सब नार वहाँ
पाठ कब सुनाएगी, थे वो इन्तजार में।
नामचीन कवि आए, हँसी का पिटारा लाए
मंच पर चुटकले, कविता के सार में
लोट-पोट सब हुए, सुन कर कविताई
सुनना वो चाहते थे, कविताई प्यार में।
भारी भरकम कवि, कविता सुनाने लगे
मेज न ये टूट जाए, थे सभी विचार में
धीरे- धीरे कवि बोला, प्रेम की ही परिभाषा
बैठना भी चाहता था, प्रेम पतवार में ।
फिर आया एक कवि, दुबला सा पतला सा
वीर रस गा के गया, बीच मझधार में
साठ के दशक वाला, हिलता सा कवि आया
नगमें सुनाए कई, उसने भी प्यार में ।
श्रोतागण ऊब गए, लम्बी कविताई सुन
बोल रहे नार आए, अगली ही बार में
मुख पर हँसी लिए, जब वह नार आई
सुध-बुध भूल गए, पड़ गए प्यार में।
मेरी जब बारी आई , झट से मैं मंच आया
कवि ही थे बचे चार, उस सभागार में
मेजबान बोल उठा, किसे सुना रहे तुम
मोटी फीस मेरी गई, लगती बेकार में।
© अरविंद भारद्वाज