माधव मेरा सजन
कितने गुनाह से भरा,तन मन मेरा सृजन,
दुनिया के रहकर करता न,भगवान का भजन।
फिर भी प्रभू की बख्शीशें,होती न कम कभी,
बिन मांगे झोली भरता है,माधव मेरा सजन।
अनदेखी करता रोज वो,कितने भी ऐब हों।
बस देता रहता तालिब को,नजरों से ग़ैब हो।
गफलत को छोड़ आज से,इबादत चलो करें,
कल कुछ भी हो सके न, बदन में शैब हो।