नज़र हमसे मिलाई कल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
नज़र हमसे मिलाई कल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
किया फरियाद हर इक पल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
सुबह निकली वो घट लेकर चली सखियों की टोली में,
भरा पनघट पे जाकर जल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
बुलाया जब मुझे मिलने फलों के उस बगीचे में,
दिये थे तोड़कर कुछ फल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
महावर पाँव में अपने, लगायी हाथ में मेंहदी,
लगया आँख में काजल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
किया था नृत्य भी आँगन के बीचों-बीच जाकर के,
जो बरसे झूमके बादल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
ख़ुदा के द्वार जाकर के भी मन्नत माँग ली दिल से,
वहाँ फैला दिया आँचल दुपट्टा ओढ़कर उसने।
राजेश पाली ‘सर्वप्रिय’