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19 Sep 2025 · 1 min read

भीड़

भीड़ के बीच अकेलापन मिलता,
हर चेहरा एक नया किस्सा खिलता।

हजारों आवाज़ें गूँजती चारों ओर,
फिर भी मन खोजे एक परिचित शोर।

कंधों से टकराकर सपने गुजरते,
कुछ चेहरे यादों में ही बिखरते।

भीड़ में हर कोई कुछ ढूँढ रहा,
शायद अपनापन या कोई चाह रहा।

हँसी के बीच छुपे आँसू कई,
सजावट के पीछे कहानियाँ नई।

कभी भीड़ देती साहस का बल,
कभी चुपचाप कर देती विफल।

हर दिशा में अलग-अलग राहें,
हर नज़र में अनकही चाहें।

भीड़ सिखाती पहचान बनाना,
अपने स्वरों को खुद जगाना।

इस शोर में भी सुन लो मन की बात,
भीड़ के बीच भी ढूँढो अपनी जात।

भीड़ का रंग अनोखा, अपरंपार,
हर इंसान है इसमें इक संसार।

कवि
विनेश

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