रातरानी चुपके से खिलती
रातरानी चुपके से खिलती,
अंधियारे में अपनी खुशबू मिलती।
दिन की भीड़ में रहती गुमनाम,
रात में बनती सितारों का धाम।
उसकी महक हवा में घुलती,
हर थकी आत्मा को शांति मिलती।
चाँदनी संग मुस्कुराती धीरे,
दिलों के दर्द को सहलाती धीरे।
कोई शोर नहीं, बस सन्नाटा,
फिर भी भर दे जादू सारा।
सिखाती कि खामोशी भी गाए,
सपनों के दीपक खुद जलाए।
रातरानी है प्रकृति का संदेश,
अंधेरे में भी होता सौंदर्य विशेष।
कवि
विनेश