रोला छंद
रोला छंद…
मांग रहे दो हाथ, हमें दे दो दो रोटी।
और सियासी बोल, रहे हम पहुंचे चोटी।।
विडम्बनायें देख, प्रश्न होते हैं लज्जित।
चमक रहे हैं दृश्य, हजारों ऐसे सज्जित।।
मुखड़े वाले लोग, बहुत होते हैं गड़बड़।
सीधी सी है बात, काम करते हैं अड़बड़।।
धोखा झूठ फरेब, स्वार्थ के ये हैं पुतले।
अवसरवादी वेष, सदा रहते हैं बदले।।
नीयत नीति नरेश, दिशा दर्शाती जनता।
समृद्धि या संत्रास, मूल उससे ही बनता।।
उत्सववादी सोच, लिए जब आता राजा।
दृश्यमान हर ओर , तरक्की का दरवाजा।।
डॉ. राजेन्द्र सिंह ‘राही’
(बस्ती उ.प्र.)