हमने आर्थिक मुद्दों पर नहीं, इज्जत की लड़ाई लड़ी है। का० शंकर गुहा नियोगी जी
शहीद कामरेड शंकर गुहा नियोगी जी की✍️ कलम से
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हमने तो इज्जत की लड़ाई की
साथियों,,
लाल जोहार
हमने आर्थिक मुद्दों पर कभी लड़ाई नहीं की। हमने सबसे पहले इज्जत की लड़ाई की। हमने प्रबंधकों से कहा कि खदानों में आपको इस ढंग से काम चलाना चाहिए और आप इस तरह नहीं चला रहे हैं। हमने जब काम की स्थितियों के बारे में बताया तो नौकरशाहों ने कहा कि तुम मजदूर हो, तुम कौन होते हो बताने वाले ? एक मामूली मजदूर को कार्य-परिस्थितियों (वर्किंग कंडीशंस) के बारे में बताने की जरूरत क्या है ? तो हमने कहा कि देश हमारा है और उसके उत्पादन में हमारा श्रम लगा है। इसमें हमारा हिस्सा भी है। इसलिए उत्पादन वृद्धि के मामले में हमारी विचार-बुद्धि भी काम आनी चाहिए। लेकिन प्रबंधकों ने हमारी सुनी नहीं। हमने कहा कि कार्य-परिस्थितियाँ ठीक न होने से जो नुकसान होगा, उसकी क्षतिपूर्ति आपको करनी पड़ेगी। हमने उन्हें बताया कि ‘फाल बैक वेजेस’ देना पड़ेगा। यानी काम हम करना चाहते हैं, पर काम नहीं मिल रहा है। काम तुम नहीं दे रहे हो, उससे मजदूरी में जो फर्क पड़ रहा है, वह आपको अदा करना पड़ेगा। यानी कुल मजदूरी का 80 प्रतिशत बैठे-बैठे दो। तो इज्जत के सवाल से शुरू होकर माँग आर्थिक बन गयी। इससे हमारी मजदूरी जो 3-4 रु. रोज थी, वह अपने आप बढ़कर 11 रुपये 96 पैसे हो गयी। प्रबंधकों ने सोचा कि बैठे-बैठे पैसे देने पड़ते हैं तो ‘वर्किंग कंडीशंस’ ही सुधार दो। दूसरी बात हमने कही कि आप लोग क्वार्टर में रहते हैं। ऐसे क्वार्टर हमारे लिए भी बना दो। हम भी मेहनत करके खाते हैं। तुम्हारे लिए इतना आराम तो हमारे लिए क्यों न हो ? यह भी हमारी इज्जत का सवाल है। तो इस मुद्दे से फिर एक आर्थिक माँग पैदा हो गयी। उन्होंने माँग मानी कि ठीक है, भई, इन लोगों को घर-द्वार सुधारने के लिए 100 रुपये दिये जायें। इन दोनों माँगों के लिए सन् 1977 में हमें गोली भी खानी पड़ी। हमारी लड़ाई तो यह थी कि हम कम नहीं हैं तुम से। माँग तो उन्होंने ही बना दी।
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लाल जोहार
राम चरण नेताम
छत्तीसगढ़ माईंस श्रमिक संघ
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
दल्ली राजहरा