था शराब के नशे में मैं
था शराब के नशे में मैं, मैंने लिखी यह कविता।
गुजर गया दिन कैसे, मुझको कुछ भी नहीं पता।।
था शराब के नशे में मैं ————————–।।
मुझको मौज आई ऐसी, कुछ होश नहीं रहा तब।
है मेरा दिल भी दीवाना, अफसोस नहीं मुझे अब।।
मुझको मिलना है किसी से, मगर कदम नहीं बढ़ता।
था शराब के नशे में मैं ————————–।।
नहीं हूँ अब मैं वैसा, जैसा था यारों पहले।
हसीन ख्वाब है मेरे, और काम मेरे निराले।।
मुझे नहीं रहना यहाँ अब, लेकिन दिल नहीं कहता।
था शराब के नशे में मैं ————————–।।
लग रहा हूँ सबको दुश्मन, कहता हूँ मैं सब बद मैं।
नहीं मुझमें बुराई कोई, रहता हूँ मैं इसी मद में।।
मत कहो दोस्त मुझे अपना, मदद कुछ कर नहीं सकता।
था शराब के नशे में मैं ————————–।।
सिर्फ मैं हूँ यहाँ ऐसा, नहीं रहता मिलकै सबसे।
मुझको मतलब है खुद से, नहीं मतलब किसी से।।
खुद्दारी होती तो है क्या, यही बात नहीं समझता।
सच कहता हूँ यारों, मैं कभी झूठ नहीं कहता।।
था शराब के नशे में मैं ———————–।।
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)