माँ
मेरा हृदय भर गया भावों से,
जब तुमने गले लगाया माँ।
नैनों से अश्रु छलक उठे,
जब तुमने प्रेम जताया माँ।।
ज्यादा मैं बातें कर न सकी,
समय की सुई गति पर थी।
देखती तुम्हें और सुनती रही,
मोह हृदय की अति पर थी।।
कुछ क्षण में ही विदा लिया,
समय भी रुक न पाया माँ।
नैनों से अश्रु छलक उठे,
जब तुमने प्रेम जताया माँ।।
बहना भी संग-संग मेरे थी,
तीनों के नैन सजल थे माँ।
ट्रेन की गति भी बढ़ने लगी,
हम तीनों ही विह्वल थे माँ।।
चरण-रज को माथे से लगा,
आशीष तुम्हारा पाया माँ।
नैनों से अश्रु छलक उठे,
जब तुमने प्रेम जताया माँ।।
@स्वरचित व मौलिक
कवयित्री: शालिनी राय ‘डिम्पल’
आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश।