हिंदी की टीचर कर ही क्या सकती है?
हिंदी की टीचर कर ही क्या सकती है?
क्या हमें वह इंजीनियर या डॉक्टर बना सकती है?
अरे! हिंदी की टीचर कर ही क्या सकती है?
हाँ बच्चों, सही कहा आपने—
ये हिंदी की टीचर कर ही क्या सकती है?
कुछ नहीं… आपको बस इंसानियत सिखा सकती है,
आपके जीवन में आदर्शों का रस भर सकती है।
बड़ों-छोटों से बात करने की तमीज़ सिखा सकती है,
सद्गुणों का दीप जलाकर आपका जीवन सँवार सकती है।
बहुत कुछ तो नहीं, पर इतना ज़रूर कर सकती है कि—
अनुशासन की डोर से बाँधकर आपको
आपके लिए जीवन के नए आयाम गढ़ सकती है।
सब करें आपसे प्यार, ऐसा व्यक्तित्व निखार सकती है।
हाँ, वह आपको बड़ा अफसर नहीं बना सकती,
लेकिन आपको बड़े अवसरों के लिए तैयार कर सकती है।
लोगों के दिलों से जुड़ने की राह दिखा सकती है,
जीवन जीने का सही सलीका
और सम्मान के साथ कदम बढ़ाना सिखा सकती है।
आपको आपके अंतर्मन से जोड़कर
सबको साथ लेकर चलना सिखा सकती है।
इसलिए कहते है बच्चों—
न आँकें हिंदी को कम, किसी विषय से,
वरना रह जाएँगे आप बिल्कुल अधूरे से।
हिंदी पर न करें कोई टीका-टिप्पणी,
कविता और कहानियों में ही तो बसती है, बच्चों की ज़िंदगी।
हामिद से सीखें महत्व उस चिमटे का,
जो लाया था वह मेले से—
ताकि उसकी दादी के हाथ न जलें
रोटियाँ बनाने से।
बिना आँखों के ही सूर ने किया
कृष्ण का ऐसा वर्णन !
वात्सल्य रस में डूबकर,
आप निहार पाओगे अपना भी बचपन।
जहाँ तुलसी ने गाया
श्रीराम की महिमा के पद,
उद्देश्य उनका था एक ही,
समाज में स्थापित हो सके उच्च आदर्श।
जहाँ कबीर ने सिखाई धार्मिक एकता,
मिटाई लड़ाई और स्थापित की समानता।
कहा—“ईश्वर को न ढूँढ बंदे मेरे तू, काबा और काशी में ।
वो है तेरे अंदर, जैसे खुशबू रहे मृग की ही नाभि में ।।”
महापुरुषों की कथाओं ने आपको नैतिकता सिखलाई,
तो वीरता लक्ष्मीबाई की भी आपको भायी।
बीरबल की कहानियों में मिला खूब आनंद,
तेनालीराम ने भी अपनी बुद्धि से, आपको चौंकाया प्रतिक्षण।
बच्चों, तनिक करिए विचार गहराई से,
क्या कुछ नहीं हो सकता हिंदी के विषय से?
इतना ही कह सकते हैं हम आपसे—
जो नहीं पढ़ेगा हिंदी, वह कैसे जिएगा ज़िंदगी?
इसके बिना जीवन हो जाएगा आपका
नीरस कुछ ऐसे,
जैसे फूल हो कोई
बिन खुशबू, बिन रस के।