दोहा मुक्तक
दोहा मुक्तक
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अपनापन की आड़ में, बढ़े स्वार्थ का भाव।
मीठी वाणी बोलकर, देते गहरे घाव।।
आया ये कैसा समय, कैसा इसका रंग,
सजग सदा उनसे रहें, जो खेते तव नाव।।
वोट चोर चिल्ला रहे, गला फाड़ कुछ लोग।
बने हुए जो संत हैं, कल तक जो थे रोग।।
सत्ता से दूरी बड़ी, करती है बेचैन,
फैलाये कल रोग जो, आज रहे हैं भोग।।
बच्चे नादानी करें, तो सबको स्वीकार।
बड़े करें तो शर्म है, उचित नहीं व्यवहार।।
आपस में दुश्मन बनें, जिनके कारण आज,
वे आपस में खेलते, बिना किसी तकरार।।
चोर चोर हैं चीखते, घूम-घूम कर चोर।
कौए सारे कह रहे, हम हैं असली मोर।।
चोरी जिनकी सामने, दुनिया देखे नित्य,
वे सारे मिलकर करें, इसीलिए ही शोर।।
चीख-चीख कर व्यर्थ ही, खुशफहमी मत पाल।
खड़ा हुआ जो सामने, नहीं बजाता गाल।।
करने से पहले करे, वो तो खूब विचार,
कौन डरा पाया उसे, करके आँखें लाल।।
हिंसक मानव हो रहा, चिंता की है बात।
कौन सुरक्षित आज है, दिन हो या फिर रात।।
पति-पत्नी के मायने, शर्मिंदा हैं आज,
नित्य सामने आ रहे, नवल घात प्रतिघात।।
भोले शंकर आइए, छोड़ आप कैलाश।
अपनी आँखों देखिए, मर्यादा का नाश।।
माँ गौरा भी साथ हों, तभी बनेगी बात,
हर प्राणी दिखता यहाँ, अब तो बहुत निराश।।
अभिलाषा जितनी बड़ी, उतनी ऊँची सोच।
तभी राह में आपके, बाधा होगी मोच।।
निर्मल मन के भाव हों, चढ़ना तभी पहाड़,
नरम गरम के संग में, रख सकते यदि लोच।।
माँ की गाली दीजिए, छोड़ शर्म संकोच।
इतनी ऊँची आप भी, रखिए अपनी सोच।
बेचारी इस जीभ का, सारा ही है दोष,
सँभल नहीं जिससे रही, उसकी अपनी लोच।।
नाहक ही चिल्ला रहे, नेता बड़े महान।
कान कटाए घूमते, नहीं देखते कान।
ईश्वर भी असहाय सा, देख रहा है आज,
कुछ मुर्गों को व्यर्थ ही, मिलती क्यों पहचान।।
जितने दोषी आप हैं, उतने हम भी यार।
फिर आपस में क्यों करें, हम दोनों तकरार।
आओ मिलकर ढूंढते, कोई नया शिकार,
उससे ही अब से करें, नाहक में हम रार।।
समय बता देता सदा, कौन आपका खास।
और कौन है तोड़ता, समय देख विश्वास।।
फिर भी धोखा खा रहे, हम सारे हर बार,
और व्यर्थ क्यों रो रहे, उनसे रखकर आस।।
सुधीर श्रीवास्तव