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19 Sep 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . इंसान

दोहा पंचक. . . . इंसान

आडम्बर से लिप्त है, अधरों पर मुस्कान ।
आभासी अब जिंदगी, जीता है इंसान ।।

औरों में उलझा रहा, गया स्वयं से हार ।
जीवन को ढोता रहा, इंसानी किरदार ।।

जिया काठ सी जिंदगी, अभिमानी इंसान ।
मुट्ठी में वह बाँधना, चाहे नील वितान ।।

बड़ा अनोखा हो गया , इंसानी किरदार ।
इंसानों से ही दोगला , करता वह व्यवहार ।।

पल – पल बदले केंचुली, दो मुख का इंसान ।
उधर लुढ़कता स्वार्थ की, मिलती जहाँ ढलान ।।

सुशील सरना / 19-9-25

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