दोहा पंचक. . . . इंसान
दोहा पंचक. . . . इंसान
आडम्बर से लिप्त है, अधरों पर मुस्कान ।
आभासी अब जिंदगी, जीता है इंसान ।।
औरों में उलझा रहा, गया स्वयं से हार ।
जीवन को ढोता रहा, इंसानी किरदार ।।
जिया काठ सी जिंदगी, अभिमानी इंसान ।
मुट्ठी में वह बाँधना, चाहे नील वितान ।।
बड़ा अनोखा हो गया , इंसानी किरदार ।
इंसानों से ही दोगला , करता वह व्यवहार ।।
पल – पल बदले केंचुली, दो मुख का इंसान ।
उधर लुढ़कता स्वार्थ की, मिलती जहाँ ढलान ।।
सुशील सरना / 19-9-25