मैं ही गुनहगार
बाहर पत्थर बने यूं खामोश सा रहता हूँ,
पर अंदर हर तूफ़ान खुद में समेटा हूँ।”
कभी इश्क़ करके, कभी दोस्ती करके,
मैं जाने कितनों का दुश्मन बन बैठा हूँ।
संवारना ख़ुद को बिलकुल आसान नहीं,
किसी का आईना बनके कई बार टूटा हूँ।
न तेरा हो सका, न किसी और का यहाँ,
मैं सच में कितना जुदा, कितना झूठा हूँ।
मैं इतना बेरहम, इतना ज़ालिम तो नहीं,
फिर भी सबकी नज़रों में क्यों चुभता हूँ।
वो ख़ुद को बहुत शरीफ़ समझता है,
लगता है गुनहगार मैं ही अकेला हूँ।
मेरी हस्ती डुबाने की फ़िराक़ में हैं अपने,
मैं हंसते हुए अपने अंदाज़ में चलता हूँ।
✍️ दुष्यंत कुमार पटेल