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19 Sep 2025 · 1 min read

कामिनी के काले-काले, केशों की शिखाएँ देख,

कामिनी के काले-काले, केशों की शिखाएँ देख,
कंठ से प्रवाहित हो, पड़ी जब रागिनी।

रागिनी का स्वर घुला, झूमने लगीं दिशाएँ,
घोर तिमिरों में जब, जल उठी ऱौशनी।

ऱौशनी को देख-देख, चाँद भी न रहा पीछे,
रात – रात भर बैठा, लुटा रहा चाँदनी।

चाँदनी में चाँद की, गोता लगा – लगाकर,
नहा धोके देखो चली, आ रही है कामिनी।

राजेश पाली “सर्वप्रिय”

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