कामिनी के काले-काले, केशों की शिखाएँ देख,
कामिनी के काले-काले, केशों की शिखाएँ देख,
कंठ से प्रवाहित हो, पड़ी जब रागिनी।
रागिनी का स्वर घुला, झूमने लगीं दिशाएँ,
घोर तिमिरों में जब, जल उठी ऱौशनी।
ऱौशनी को देख-देख, चाँद भी न रहा पीछे,
रात – रात भर बैठा, लुटा रहा चाँदनी।
चाँदनी में चाँद की, गोता लगा – लगाकर,
नहा धोके देखो चली, आ रही है कामिनी।
राजेश पाली “सर्वप्रिय”