इस तरह से ज़िंदगी ना नर्क होना चाहिए।
इस तरह से ज़िंदगी ना नर्क होना चाहिए।
तीरग़ी में भी कभी तो अर्क होना चाहिए।
कब तलक सच्चाई को यूँ ही दबाते जाओगे,
बेईमानी का भी बेड़ा गर्क होना चाहिए।
खूब पूजन और अर्चन कर चुके हम लोग तो,
ईश्वर से खुल के अब संपर्क होना चाहिए।
मछलियाँ हैं मेंढ़कों के साथ कितने जोंक हैं,
अब तो इस तालाब में भी कर्क होना चाहिए।
दूसरों के ही भरोसे जी रहे कुछ लोग तो,
अपने भी इंसान के कुछ तर्क होना चाहिए।
हो अगर हिन्दू-मुसलमाँ तुम अगर ऐ आदमी,
फिर तुम्हारे खून में भी फर्क होना चाहिए।
राजेश पाली ‘सर्वप्रिय’