वजह मिल गई
मुरझाई मन की हर कली खिल गई।
ज़ीनें की हमें एक वजह मिल गई।।
उसे देखा हमनें जब पहली दफा।
चश्मा अपना करने लगा मैं सफा।
पहली दफा चारु देखी थी नारी।
धड़कने लगी जोर धड़कन हमारी।
कह न पाए कुछ भी रसिका सिल गई।
ज़ीनें की हमें एक वजह मिल गई।।
जब से आई ज़िन्दगी में हमारी।
छाई है तन पे अजब सी खुमारी।
मिट गई उदासी तन-मन की सारी।
लगने लगी जिंदगी ज्यादा प्यारी।
चुरा मेरा सीने से वो दिल गई।
ज़ीनें की हमें एक वजह मिल गई।।
सिर्फ कण- कण में वो ही आती नजर।
उसके बिना एक पल न होता बसर।
जाती है जैसे जिंदगी यह ठहर।
हमें छोड़कर जब दूर जाती शहर।
लगे सूनी कर मेरी महफ़िल गई।
ज़ीनें की हमें एक वजह मिल गई।।
उसके ख्यालों में खोया रहता हूँ।
उसको ही हर पल सोचा करता हूँ।
फोटो थैले में उसका रखता हूँ।
खुद से ज्यादा उसपे मैं मरता हूँ।
जिसकी चाह थी मिल वो मंजिल गई।
जीनें की हमें एक वजह मिल गई।।
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)