#दृग_में_स्वप्न_पला_करते_कम_कोर_भिगोता_पानी_है।
#दृग_में_स्वप्न_पला_करते_कम_कोर_भिगोता_पानी_है।
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मन मेरा आलय पीड़ा का,
जीवन व्यथा कहानी है।
विधि की यह मनमानी है।।
क्षुधा सताये हर दिन पल-पल, पर पीड़ा न दे पाती।
व्यथा रोग संताप सकल ही, अपने आलय की थाती।
इन्हीं गथों के वशीभूत फिर, हम मांझी बन जाते हैं।
दुष्कर श्रम से बेध शैल को, नूतन पंथ बनाते हैं।
कठिन साधना के अननुपद भी
मिलता कष्ट निशानी है।
विधि की यह मनमानी है।।
युगों – युगों से भाग्य हमारा, करता नित दिन अटखेली।
कंगाली घर ऐसे फैली, जैसे कोई घनबेली।
स्वाद कसैला मधुर मनोहर, या फिर चाहे हो तीखा।
मन की पीड़ा मन में रखना, बचपन से हमने सीखा।
कब बच्चे थे बृद्ध हुए कब,
कब मिट गई जवानी है?
विधि की यह मनमानी है!!
संसारिक सुख दूर हमेशा, दुख से बंध सदा गहरा।
गेह हमारे अवसादों का नित्य लगा करता पहरा।
मोद युक्त पल को ठुकराकर, विपदाओं को अंक भरे।
करवट लेटा भाग्य हमारा, दुर्दिन का आतिथ्य करे।
दृग में स्वप्न पला करते कम,
कोर भिगोता पानी है।
विधि की यह मनमानी है।।
✍️ संजीव शुक्ल ‘सचिन’