बाप का सच (हरियाणवी रागनी)
बचपन मैं लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
बात कम बोले, डाँट दे कड़ा।
सोचूं — क्यों चुप रहै ये जाट सा,
हँसे भी तो, बोले बात नाट सा।
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
जद मैं खूद बन्या एक छोरे का बाप,
तद खुला ज़िंदगी का असली हिसाब।
उसकी चुप्पी मैं चिंता छुपी रहै,
हर डाँट मैं भी दुआएँ लिपी रहै।
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
अब समझ आ ग्या मुँह पे जो थकान,
मौन में छुपी रहै ममता की पहचान।
छोरा भले कम बैठ्या गोदी पास,
बाप रह्या हर दम छोरे के आस-पास।
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
जेब खाली होवे तो दिल दुख जागै,
पर छोरे के सपने पूरे कर लागै।
खुद फटे कपड़े मैं भी काट लेवै,
पर छोरे की खुशी पे जान लुटा देवै।
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
बाप का दिल समुंदर सा गहरा,
बोलै कम, पर करै बहुत पहरा।
छोरियां-छोरे के वास्ते जीवे,
अपने अरमान भी चुपचाप सीवे।
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
बुढ़ापे मैं आँख में पानी भर जागे,
बचपन की याद में दिल भी डर जागे।
कदे डाँटे तो पछतावा करै,
पर छोरे पे प्यार दोगुना धरै।
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
लाग्या बाप सख़्त बड़ा,
लाग्या बाप सख़्त बड़ा।