मन होता बेहाल
क्वार माह अवकाश ले,गया घूमने गाँव।
देख दशा निज गाँव की,फूल गए मम पाँव।।
फूल गए मम पाँव,देख मग ऊबड़- खाबड़।
उजड़े थे सब बाग, पड़े रकबे थे चापड़।
फैली भीषण गंध,गाँव के हर एक द्वार।
बहे मूसलाधार,नगरी के नाले क्वार।।
देख गाँव की ये दशा,मन होता बेहाल।
कभी सुघड़ इस गाँव में,सजती थी चौपाल।।
सजती थी चौपाल,गाँव की शाम सुहानी।
सुनते थे सब बैठ,यहीं पर मधुर कहानी।
होता था हर रोज, नव विषयों का उल्लेख।
सब होते थे दंग,पुर सुन्दरता को देख।।
फिर से अपने गाँव की,बदलेगी तस्वीर।
गाँव स्वच्छता के लिए, होंगे सब गंभीर।।
होंगे सब गंभीर, करेंगे गाँव सफाई।
देगा सबसे चारु,हमारा गाँव दिखाई।
हो जाए आजाद,हमारा गाँव तिमिर से।
गाँव मध्य बहु फूल,रुचिर महकेंगे फिर से।।
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)