जीवन का प्रारूप
गिरगिट के जैसे बदल, रहे मनुज नित रूप।
भूल रहे निज आचरण,जीवन का प्रारूप।।
छोड़ सभ्यता देश की,बदल रहे निज वेश।
अपने भारत से अधिक,भाता है परदेश।।
इनको भाते हैं नहीं, सुन्दर नेक विचार।
छोड़ संग निज नारि का,करते नित व्यभिचार।।
दौलत पाने के लिए, करते गंदे काम।
बुरे कर्म करके डुबा, रहे वंश का नाम।।
छोटी-छोटी बात पर, करते रहते रार।
उर इकदूजे के लिए, रखते हैं बस खार।।
दूध दही को छोड़कर, करते माँसाहार।
इसीलिए अब के मनुज, रहें अधिक बीमार।।
पीकर मदिरा नारि से, करते खूब विवाद।
दौलत दारू में लुटा, घर करते बर्बाद।।
भक्ति भाव से राम का, लेते कभी न नाम।
डूबे हाला में रहें,सुबह दोपहर शाम।।
अपने से बड़ का नहीं, करते हैं सम्मान।
दीन-हीन कमजोर का, करते नित अपमान।।
मात-पिता बड़ भ्रात की, नहीं मानते बात।
नित आवारों की तरह, घूमें सारी रात।।
अगर मानवों ने नहीं,बदला बुरा स्वभाव।
हो जाएगा एक दिन, दुनिया से अलगाव।।
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)