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18 Sep 2025 · 1 min read

ग़ज़ल: हर मोड़ पे रास्ते अनजान मिलेंगे

हर मोड़ पे रास्ते अनजान मिलेंगे,
तन्हा न रहोगे, हमसफ़र जान मिलेंगे

सहरा से गुज़रना है तो दिल मज़बूत रखो,
सोचो न कि मुश्किलें बेज़बान मिलेंगे

सफ़र की तपिश में न घबराओ मुसाफ़िर,
छाँवों के लिबास में बाग़बान मिलेंगे

आँखों में सँजो लो ख़्वाबों की चमक तुम,
राहों में हज़ारों नए अयान मिलेंगे

हर रंग की मंज़रकशी देखोगे “रईस”,
कहीं दर्द मिलेंगे कहीं ग़ुलिस्तान मिलेंगे

मंज़िल पे पहुँचते ही समझ जाओगे तुम,
रस्तों के सफ़र में ही आसमान मिलेंगे

ग़मगीन लम्हों से न कांपो ऐ मुसाफ़िर,
आँसुओं के दरिया में कुछ गुलफ़िशान मिलेंगे

ख़ुद्दारी से चलना, न झुकना कभी तुम,
झुकते ही दर-ओ-दीवार बेईमान मिलेंगे

“रईस” तेरे अशआर गर दिल से निकलें,
महफ़िल में सुनाने को मेज़बान मिलेंगे

©️🖊️ डॉ. शशांक शर्मा “रईस”

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